Tuesday, 26 July 2016

142. रिश्तों की धूप-छाँव

रिश्तों की धूप में थोड़ी सी छाँव बाकी रहे
चुभती चुप्पियों में थोड़ा सम्वाद बाकी रहे..

दरख्तों के इर्द - गिर्द परिंदों की अठखेलियां
रिसती उँगलियों की पोर में थोड़ा रियाज़ बाकी रहे..

बढ़ती उम्र की संजीदगी में बचपन की नादानियां
आँखों में न सही,जेबों में सही ,थोड़े ख्वाब बाकी रहे..

मनमुटावों की सरहद से चलो अब लौट आएं
खुद को ढूंढने की सलाहियत साथ में बाकी रहे..

चलो दो पल कहीं पर बैठ कर दो लफ्ज बुन डालें
सिमटते सूखते से ताल में थोड़ी नमी बाकी रहे..

उलझती जा रही इन गुत्थिय़ों में बसी नर्मियां
शहरियों के मन में थोड़ा सा गाँव बाकी रहे..

पीड़ित बुजुर्गों का रख-रखाव और प्यार
चरित्र की गिरावट मेंं भी आत्मा का उठाव बाकी रहे..

आज की पीढ़ी में विनम्रता और झुकाव
राष्ट्रोन्मुख चिन्तन का मनोभाव बाकी रहे..

मर्यादा और मान से सींचित घर खलिहान रहे ...
कभी फसल का कभी हल से खुदा परिधान बाकी रहे

संबंधों में दिल का संबोधन साया दे, धूप दे
रिश्तों की धूप में थोड़ी सी छाँव बाकी रहे....

(सहभागिता ~चित्रा देसाई ,भूपेन्द्रसिंह,आनंद खत्री ,गुंजन अग्रवाल ,अल्पना नागर,फ़र्रुख नदीम,सरोजसिंह परिहार,उत्कर्ष सिंह सोमवंशी )