Wednesday, 15 June 2016

#. 120. चाह नहीं

प्रख्यात कवि श्री माखनलाल चतुर्वेदी जी को श्रद्धांजलि स्वरुप उनकी  सुप्रसिद्ध रचना     " चाह नहीं सुरबाला के गहनों में गुंथा जाऊ " से प्रेरित ....


चाह नहीं शरमाई कली से 
खिल कर महक बन जाऊं,
 चाह नहीं रंगों से ओत प्रोत
 इंद्रधनुष मैं बन जाऊं, 
चाह नहीं बन कर मोती 
रत्नों संग जड़ा जाऊँ,
 चाह नहीं होकर ध्वनित
 कलरव सा गूंज जाऊँ, 
चाह नहीं बन सीप 
समंदर गहरे तल समा जाऊं, 
चाह नहीं बन इत्र गुलाल 
पग पग मैं सबके मेहकाऊँ, 
चाह नहीं रंग रोगन से
 मैं चक्षु को फुसलाऊं, 
चाह नहीं बन प्रेम पत्र मैं
 युवा मन को बहलाऊं, 
चाह नहीं ऊँचे भवनों की 
शान पताका बन लहराऊं, 
चाह नहीं आकर्षित करने
 केश सज्जा के काम आऊँ, 
चाह नहीं गुलदान में महकूँ
 आगंतुक मन हर्षाऊं, 
चाह नहीँ सतरंगी सपने
 इन आँखो में रोज़ सजाऊं,
 चाह नहीं यूँ शाँत बैठकर
 गीत सुहाने मैं गाऊँ,

 चाह है मेरी तो सर्वदा 
मुझको रंग तिरंगा कर दे
 तो झूमूँ नभ में लहराऊँ, 
बन कर कीर्ति पताका 
भारत नाम जग में फहराऊँ, 
गूंथा जाऊं उस माला में
 सैनिक को जो पहनानी हो, 
भारत माँ की रक्षा की ही 
जिसने मन में ठानी हो...!!!

(~सहभागिता ~ सुधीर पांडे, आनंद खत्री , अनिता शर्मा ,अल्पना नागर ,गुंजन अग्रवाल,राजेश सिक्का ,  फ़र्रुख नदीम ,प्रांजल पांडे )

14/06/16




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