Monday, 10 October 2016

#180- शिवना का गाँव


                                            शिवना का गाँव 
पहाड़ियों से घिरा हुआ नदी किनारे का वो सुरम्य गाँव ,जहाँ चहुँऔर हरियाली बिखरी पड़ी थी,सब उसे " शिवना का गाँव " कहते थे | लेकिन आखिर ये नाम पड़ा कैसे ?
नदियों के वेग को सँभालने धरती पे लकीर गहरी पड़ी थी। वनस्पति , खग, जीव सब अद्भुत रूप यौवन से सजे थे। आखिर शिवना में जग रही कैसी घड़ी थी ?
झर - झर बहता निर्झर,अपनी तीव्र गति के साथ नए उन्माद में जाने किस ओर बह रहा था। निर्झर से बहता संगीत कानों में जैसे मधुरस घोलता था और झरने से झरती बूंदें मोती की लड़ियों का आभास देती थीं ..... , इस शांत सुरम्य और सुंदर गाँव को लोग शिवना का गाँव कहते थे ! कैसे पड़ा ये नाम ?
 इसकी भी एक कहानी है .... गाँव में इसी झरने के किनारे पहाड़ी पर एक शिव मंदिर है ...
अदम्य सुन्दर पहाड़ियों से घिरे इस शिव मन्दिर की कहानी शिवना नामक युवक से जुड़ी है .....जो अपनी युवावस्था में एक लड़की से प्यार करता था....शिवना -- जैसा नाम, वैसा ही सरल स्वभाव था उसका। 6 फुट का ऊँचा कद, बलिष्ठ शरीर,गेहूंआ रंग,घुंघराले काले बाल,सुरीली आवाज, मोहक मुस्कान का स्वामी शिवना अपने सहयोगी स्वभाव, मधुर वाणी, सरल ह्रदय के कारण सभी का दिल जीत लेता था।
शिवना बाँसुरी भी बहुत सुन्दर बजाता था.....उसकी बाँसुरी की लय् पर समस्त प्रकृति भी मानो थिरकने लगती थी.....शाम के धुंधलके में जब वो बंशी की तान छेड़ देता, तो नदी का कलरव करता हुआ जल भी शांत चित्त हो उसकी तान में तान मिलाने लगता ......सौम्य मनोहारिणी दृश्य आँखो को खूब लुभाता था ।नदी ही नहीं..पशु- पक्षी भी उसकी बाँसुरी की धुन में मंत्रमुग्ध होकर खो जाते थे ,गाँव का बच्चा- बच्चा जानता था कि शिवना की बाँसुरी में कोई ना कोई जादू है ,फिर भला शिवाँगी कैसे उसकी बाँसुरी के मोहपाश में नहीं बंधती ! शिवाँगी गाँव के ही मुखिया की बेटी थी ।रंग साँवला ,मझोला कद ,गठीला शरीर ,देखने में अत्यंत साधारण कन्या । लेकिन गुणों की तो जैसे खान थी वो। वो जो भी कार्य करती,इस सुघड़ता से करती,कि देखने वाले दांतों तले उंगली दबा लेते। ईश्वर ने उसे सौन्दर्य भले ही तंग हाथ से दिया हो,किंतु विभिन्न कलाओं में पारंगत कर भेजा था धरती पर।जब वो अपनी सुरीली तान छेड़ती,तो कोयल कुहुकना भूल उसे सुनने लगती,हवा थम जाती, चैतन्य जगत जड़ हो जाता।
शिवांगी शिवना से बेहद प्यार करती थी,  दोनों रोज पहाड़ी के मन्दिर में मिलते, घंटो साथ समय बिताते|
 ये बात शिवांगी के पिता को , जो की गाँव के मुखिया थे , को भी पता थी।
वो ये भी जानते थे की शिवना गरीब परिवार से ताल्लुक रखता है, और वे खुद ठहरे गाँव के मुखिया.....पर ये सच है की वो उसकी हैसियत पैसों से नही आंकते थे , बल्कि उसके गुणी और सरल स्वभाव पे मोहित थे और अपनी बेटी के लिए ऐसा ही योग्य लड़का चाहते थे।
वे जानते थे ,जिसमें गुण है,वो कभी भूखा नहीं रहेगा और न ही उनकी बेटी को भूखा रखेगा ।अपनी मेहनत से एक रोज शिवना भी उनकी तरह समाज में अपनी पहचान बनाएगा ।
पर किस्मत को तो कुछ और ही मंजूर था..
जैसा कि होता आया है, की हर कहानी में एक नायक होता है और एक नायिका होती है, वैसे ही एक खलनायक भी होता है ..कभी वो डकैत, लुटेरा ,कभी साहूकार, कभी बिमारी और कभी समाज की बुराइयों का रूप ले कर आता है ....
ऐसा ही हुआ शिवांगी और शिवना के साथ .... लेकिन कहानी कुछ अलग है ...उन दोनों  का विवाह बड़ी धूमधाम से हुआ , पूरा गाँव सम्मिलित हुआ इस विवाह में ...उनके दिन पंख लगा कर उड़ने लगे ...लेकिन .. आर्थिक असमानता का ख़लनायक दोनों  के बीच आने लगा ... शिवना जब भी किसी उत्सव में शिवांगी के परिवार में शामिल होता ,उसे हीनता का एहसास होता.... शिवांगी की सहज बातें भी उसे हीनता का एहसास करातीं.... और धीरे- धीरे यह रोग बढ़ता ही गया ...
शिवांगी के भाई का विवाह था.... उपहार में देने के लिए शिवना एक अंगूठी लाया अपनी हैसियत के हिसाब से...
! मुँहदिखाई के समय जब शिवांगी ने अंगूठी भाभी को दी .तो एक महिला ने परिहास करते हुए कहा....अंगूठी तो पत्ते जैसी है......ठीक उसी समय शिवना वहां से गुजरा और यह बात उसके दिल में तीर की तरह चुभ गई.......
! रात्रि भोज के समय शिवना का कहीं पता न था... सब ढूंढ़ कर थक गए.... शिवांगी बदहवास सी दौड़ती हुई घर आई . शिवना वहाँ भी न था....लेकिन तकिए पर उसकी की चिट्ठी थी.....
प्रिय शिवांगी..
मै तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ ...
लेकिन मैं तुम्हारे स्तर का नहीं ....
मैं जा रहा हूँ...जब तुम्हारे लायक बन जाऊँगा तो वापस जरूर आऊँगा ... मेरा इंतजार करना... तुम्हारा शिवना...!
इस बात को सात साल हो गए...
शिवानी पत्थर जैसी हो गई ...
ऊलझे बाल और वीरान आँखें....
वह बस एक शब्द बोलती  ...शिवना.शिवना शिवना ...!! . शिवांगी हर शाम बेसुध सी उसी मंदिर में पहूँच जाती है..... शिवना का इंतजार करने...... और मंदिर के घंटे से एक ही स्वर सुनाई देता.....
शिवना.....शिवना.....शिवना.....
शिवना कहीं नहीं था ।बहुत तलाश किया गया लेकिन सब व्यर्थ ,शिवना सामाजिक व आर्थिक विषमता से बहुत ज्यादा आहत हुआ था ,उसके क़दम गाँव से बाहर तो पड़े थे लेकिन किसी अच्छे उद्देश्य से ,किसी को इस बात की भनक तक ना थी कि मामूली सा शिवना अपने बाँसुरी बजाने के हुनर को किस सीमा तक आगे लेकर जायेगा ।
शिवना नें एक बड़े शहर में आकर अपना भाग्य आजमाया ,उसकी बाँसुरी के हुनर को एक बहुत बड़ी संगीत कम्पनी के मालिक नें पहचाना ,खुद शिवना नें भी कभी नहीं सोचा था कि उसका भाग्य और कर्म उसे ज़िंदगी के किस मार्ग पर लेकर जाने वाले हैं |
अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर शिवना के लिये प्रस्ताव आने लगे ,शिवना नें भी स्वयं को संगीत साधना में पूरी तरह रमा लिया था ,देखते ही देखते शिवना बहुत बड़ा बाँसुरी वादक बन गया ,सरस्वती व लक्ष्मी दोनों उसके पास थी ।समय बीतता गया और शिवना की झोली में पद्म विभूषण से लेकर भारत रत्न तक आते गये ,लेकिन शिवना अपने अतीत को नहीं भूल पाया..उसे रह- रह कर अपने गाँव और शिवाँगी की याद आती |अब उसके जीवन का एक ही उद्देश्य रह गया था...सामाजिक व आर्थिक विषमता की गहरी खाइयों को पाटना ।
शिवना नें कमर कस ली ,उसने गाँव -गाँव जाकर गरीब बच्चों को निःशुल्क बाँसुरी वादन प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया व अपने धन का प्रयोग बहुत सी संगीत अकादमी खोलने में किया जिसमें आर्थिक रूप से अक्षम लोगों को मुफ्त प्रशिक्षण दिया जाता था ।शिवना अब बहुत प्रसिद्ध हो चुका था उसके चर्चे उसके गाँव तक पहुँचे ,अब वही लोग जो कभी उसकी गरीबी का उपहास किया करते थे आज उसकी एक झलक देखने को उत्सुक हो रहे थे ,शिवाँगी जो शिवना की याद में बेसुध होकर जीवन व्यतीत कर रही थी ,शिवना की ख़बर पाकर जैसे पुनः जीवित हो उठी ।शिवना अपनी मुहिम को पूरा करने के क्रम में स्वयं अपने गाँव आया..पूरा गाँव उसे देखने को उमड़ पड़ा ,भीड़ को चीरती हुई शिवाँगी भी शिवना से मिलने आ पहुँची ,इतने वर्ष बाद एक दूसरे को देखकर आँखों से अश्रुधारा बह निकली ।बहुत ही भावविभोर करने वाला दृश्य था ।गाँव वालों को अपनी संकीर्ण सोच पर बहुत ज्यादा पश्चाताप हो रहा था ,सभी ने मिलकर शिवना से गाँव में ही रहने का अनुरोध किया जिसे शिवना नें सहर्ष स्वीकार किया..इसी खुशी में गाँव के सरपंच नें गाँव का नया नामकरण शिवना के नाम पर करने की घोषणा की । 

और इस तरह  वो गाँव "शिवना का गाँव " कहलाया जाने लगा |

(~सहभागिता -- सरोज सिंह परिहार ,अनिता शर्मा ,उत्कर्ष सिंह  सोमवंशी ,अल्पना नागर ,आनंद खत्री ,चारू अग्रवाल ,माधुरी स्वर्णकार )

Saturday, 1 October 2016

# 178 - नव-रात्रों के आगमन पर

नव ओज,नव सोच और ऊर्जा नयी है
माँ के आगमन से उल्लासित भोर हुई है
मिटे कष्ट सब फैला हर सू उजाला
नवल दिव्य छवि माँ का दर्शन निराला!
नव भाव नयी सोच का आरंभ तुम्ही हो
दिव्य हैं माँ के दर्शन जगमग है देवाला
देव-शक्ति, मनुष्य-मूल का सूत्र तुम्ही हो
तुम्हीं आदि शक्ति तुम्ही कल्याणी हो
वन्दना-प्रसंग, प्रजा का वन्द-प्रसार तुम्ही हो
अन्न दायिनी श्वेत वस्त्र धारिणी मातु भवानी तुम्ही हो
विचार का साकार, दृष्टि को आकार तुम्ही हो
शक्ति प्रदायिनी ,सर्व सुख दायिनी
मंगल कारिणी, रिपु दल हारिणी तुम्ही हो
सूत्र जगी शक्तियां, उत्पीड़ितों का दर्द भी
अपराध-दोष को क्षम्य-याचना भी तुम्ही हो।



~ अनिता शर्मा , सरोज सिंह परिहार, सुधीर पान्डे, अल्पना नागर, माधुरी स्वर्णकर, चारु अग्रवाल, आनन्द खत्री 

Friday, 12 August 2016

# 154 क्या यह पतझड़ की साँझ सखे

सह भागिता - हरिवंश राय बच्चन


"नीलाम के पल्लव टूट गये
मरकत के साथी छूट गए
अटके फिर भी दो पीत पात, जीवन डाली को थाम सखे
है यह पतझड़ की साँझ सखे" ~ हरिवंश राय बच्चन

कल फिल नव कोंपल फूटेंगी
कलिंयाँ फिर नवरस लूटेंगीं
यह शास्वत सत्य सृजन का है,मत समझो इसे विराम सखे
क्या यह पतझड़ की साँझ सखे

सूखे दिल पोखर कूल सभी
प्यासे पर अश्रु की धार सधी
निज चिंतन को यादें दो घट, जीवन कविता श्रृंगार सखे
क्या यह पतझड़ की साँझ सखे

मुझसे मेरा घट छूट रहा
व्याकुल मन भी यह रूठ रहा
क्यूं विरह अगन में जलते हैं,मेरे नयना दिन रात सखे
क्या यह पतझड़ की साँझ सखे।।

नव बसंत कल फिर आयेगा
मन में उल्लास जगायेगा
मत रोको इन अहसासों को,हैं यह सांस और प्राण सखे
क्या यह पतझड़ की साँझ सखे।।

जब साँझ का कलरव फूटेगा
मधुघट पर बेला महकेगा
जब चषक सधे लब पर लब हों , फिर क्यों ऐसा वैराग सखे
क्या यह पतझड़ की साँझ सखे

होते अधीर मुख कांति नहीं
जीवित है पर विश्रांति नहीं
सद्चिंतन अंगीकार करो,सुख-दुःख हैं बस परिधान सखे
क्या यह पतझड़ की सांझ सखे

जब ढली दोपहर जीवन की
मन मरुथल की तरूणाई के
इक अनजाने बंधन में तू , अब मत इस मन को बांध सखे,
क्या यह पतझड़ की सांझ सखे ।

सुरभित कर मन कलिकाओं को
आनंद की इन क्षणिकाओं को
कोमल भावों के धागे से, इक प्रेम डोर में बाँध सखे
क्या यह पतझड़ की साँझ सखे।

बढ़ा क़दम रुके नहीं
निशा में भी थके नहीं
कर असंख्य तू सृजन, यह वक़्त की पुकार सखे
क्या यह पतझड़ की साँझ सखे!!!

देह विटप से विलग पात
कोंपल बन आते पुनः साथ
फिर क्यूं कहते हो अंत प्रिये , यह सृष्टि का है चक्र सखे
क्या यह पतझड़ की साँझ सखे ?

क्या हुआ कल्पना गुमसुम है
क्या हुआ कोर दृग भी नम है
नजरे पथराई जैसी और हुई भावना बाँझ सखे
क्या यह पतझड़ की सांझ सखे

इस बेला में पाई उलझन!
अपने मन से होती अनबन!!
जीवन को धवल बना खुदको, अब अच्छे से दे माँज सखे
क्या यह पतझड की साँझ सखे

सायों की बढती लंबाई
और गहरी होती तन्हाई
इस रंगपटल पे चलते हैं, सतत बहुत से स्वांग सखे !!
क्या यह पतझड़ की सांझ सखे

~ गुंजन चारु अग्रवाल, शैलेन्द्र चौहान, अल्पना , सुधीर पाण्डे, सरोज सिंह परिहार , आनन्द खत्री (सूफ़ी बेनाम)



Thursday, 4 August 2016

# 59 "बोगनविलिया तेरी रंगीन दोपहरी "



हे ! बोगनविलिया तेरी रंगीन दोपहरी
थक कर हवा तेरे घने से साए में ठहरी ..

इतनी धूप है फिर भी तेरी रंगत गहरी !!
बोलगी अब बहुत जोर से याद -टिटहरी..

खिला फूल- सा देखो यहाँ हर शाख -पत्ता भी
सूखी धुप में भी रंग-ओ-ख़ुशी है बिखेरी..

घर के दरवाज़े पे पुरखों  की अब भी प्रहरी
अलमस्त नवोढ़ा, बिखरे यौवन देहरी..

अब भी लगती है काग़ज़ के फूलों  जैसी
गाँव लौटकर तेरी वो बातें शहरी..

साए में तेरे बैठना भी पुरसुकून है
सुनकर बुजुर्गो की नसीहते गहरी..

कांटे, ठूंठ पात -दर -पात श्रृंगार वल्लरी
रंगीन लहरिया पहन नाचता भर दुपहरी..

बोगनविलिया जरा सा सुन तो ले री
कितने अरमान जगाती निःस्तब्ध दोपहरी..

तृप्त क्षुधा बाद आती  दिन नींद सी प्यारी
हवा का झोंका, थकावट और ये खुमारी..

हे ! बोगनविलिया तेरी रंगीन दोपहरी...!!!




(~ सहभागिता~ सरोज सिंह परिहार ,सुधीर पांडे ,आनंद खत्री,उत्कर्ष सिंह सोमवंशी,फर्रुख नदीम,राजेश सिक्का,अनिता शर्मा )






17/04/16

Wednesday, 3 August 2016

#35 तरकश में रच ख्याल बसी थी



तरकश में रच ख्याल बसी थी
तुमको पाने की हर ख़्वाहिश

छल धार तीर ले तरुणी थी
क्या है बाकी कोई गुंजाइश

तनी कमानी भवें चलानी थी
रख रहीं हैं एक फरमाइश

रिश्ता रिश्ता भटक रही थी
डोर बंधी उम्मीदों की गर्दिश

इस तलाश का अंत नहीं अब
कहो क्या आखरी आजमाइश

तीर लगे फिर जाँ क्यों नहीं जाती
किसकी दुआओं  की है गुज़ारिश..

(~सहभागिता - आनंद खत्री, चारू अग्रवाल,अंजली ओझा,राजेश सिक्का,फर्रुख नदीम,विकास त्रिपाठी )




01/04/16

# 31 - खुले आसमां में परिंदे को देखो



खुले आसमां में परिंदे को देखो
कितनी बुलंद परवाज़ है इसकी
फ़रिश्ते ,इंसान और शैतान के नुमाएंदे देखो
आसमान पे हक बनाये हुए है
इंसा में जीने का जज़्बा जगाये हुए है
कुछ बोझ- सा भी परों पर उठाए हुए हैं

निकला है बच्चों की भूख मिटाने
या भटकते बादलों को रास्ता दिखाने
ऊँचा, ऊँचा और ऊँचा उड़ा जा रहा है
पंखों से सूरज ढके जा रहा है
अपनी क़ाबलियत से रूबरू करा रहा है
सात घोड़ों से दौड़ है उसकी

जैसे मज़हब से परे इन्सान को देखो
कैसे आपस में भाईचारा निभा रहा है..!

(~ सहभागिता - आनंद खत्री ,अंजली ओझा, राजेश सिक्का ,अनिता शर्मा , उत्कर्ष सिंह सोमवंशी, फर्रुख नदीम ,चारू अग्रवाल)



#30-बूँद का सफर

# 30 बूँद का सफर - ये सफर लिखते समय ये कोशिश करनी है कि बूँद से पानी, पानी के अलग -अलग रूप , पानी के मुहावरे (जैसे "खून पानी है "), उपमा ,इत्यादि का स्तेमाल करते हुए लिखें।


शबनम की बूँदें सूखे पत्तों पर
बहती रहीं सुर्ख आँखों के रास्ते भी
दिल में दबी आतिश से भाप बनकर
उड़ती रही सहराओं में कहीं कभी
धुंधला आंखों की कफ़स को करती रही
चश्म-ए-नम आंखों की खासलत रखती भी
छिपाये दिल में कितने सवाल रखती है
वहीं जो खून-आब को गुलाल रखती भी
निखरती रही धूप की तपिश सह- सह कर
फूलों में जश्ने शबाब रखती भी
वो सीने में अख़्गर, आंखों में तुषार रखती है
बर्फ का सेक रखती हैं तुम्हारी गुज़री यादें भी
वो शंग आबेरवाँ -सा मिजाज रखती है
बंजर मिटटी हर बूँद सोखने का अंदाज़ रखती भी
शबनम को जलने दो के भाप तबियत में परवाज़ रखती है
चरम तक उड़, भाप बादली आभास रखती भी
बन फिर मेघदूत भ्रमण को निकलती है
और अंत में जा सकती हैं खुद में धरती भी ....
समुन्दर से पूछती की तुझ में मैं, कि मुझ में तू है
किसी आँचल में मेरे माथे की महक बसती भी
इस ममता के लिए कई ज़िंदगियाँ तरसती है
क्यों अब्रे आसमान से ज़मीन पे उतरती भी
शबनम की बूंदे सूखे पत्ते पे आ के रूकती है
रख सबर,अधजल गगरी सा क्यूँ छलकता है
सागर की लहरो सी क्यों वो मचली भी
उजले कोहसरों से फिसलती, पिघलती है
भृष्टि की हर बूँद क्यों प्यासी भी................

(~सहभागिता - आनंद खत्री , चारू अग्रवाल'गुंजन', अनिता शर्मा,फर्रुख नदीम,राजेश सिक्का,विकास त्रिपाठी,अंजली ओझा )










29/03/16