# 30 बूँद का सफर - ये सफर लिखते समय ये कोशिश करनी है कि बूँद से पानी, पानी के अलग -अलग रूप , पानी के मुहावरे (जैसे "खून पानी है "), उपमा ,इत्यादि का स्तेमाल करते हुए लिखें।
शबनम की बूँदें सूखे पत्तों पर
बहती रहीं सुर्ख आँखों के रास्ते भी
दिल में दबी आतिश से भाप बनकर
उड़ती रही सहराओं में कहीं कभी
धुंधला आंखों की कफ़स को करती रही
चश्म-ए-नम आंखों की खासलत रखती भी
छिपाये दिल में कितने सवाल रखती है
वहीं जो खून-आब को गुलाल रखती भी
निखरती रही धूप की तपिश सह- सह कर
फूलों में जश्ने शबाब रखती भी
वो सीने में अख़्गर, आंखों में तुषार रखती है
बर्फ का सेक रखती हैं तुम्हारी गुज़री यादें भी
वो शंग आबेरवाँ -सा मिजाज रखती है
बंजर मिटटी हर बूँद सोखने का अंदाज़ रखती भी
शबनम को जलने दो के भाप तबियत में परवाज़ रखती है
चरम तक उड़, भाप बादली आभास रखती भी
बन फिर मेघदूत भ्रमण को निकलती है
और अंत में जा सकती हैं खुद में धरती भी ....
समुन्दर से पूछती की तुझ में मैं, कि मुझ में तू है
किसी आँचल में मेरे माथे की महक बसती भी
इस ममता के लिए कई ज़िंदगियाँ तरसती है
क्यों अब्रे आसमान से ज़मीन पे उतरती भी
शबनम की बूंदे सूखे पत्ते पे आ के रूकती है
रख सबर,अधजल गगरी सा क्यूँ छलकता है
सागर की लहरो सी क्यों वो मचली भी
उजले कोहसरों से फिसलती, पिघलती है
भृष्टि की हर बूँद क्यों प्यासी भी................
(~सहभागिता - आनंद खत्री , चारू अग्रवाल'गुंजन', अनिता शर्मा,फर्रुख नदीम,राजेश सिक्का,विकास त्रिपाठी,अंजली ओझा )
29/03/16
शबनम की बूँदें सूखे पत्तों पर
बहती रहीं सुर्ख आँखों के रास्ते भी
दिल में दबी आतिश से भाप बनकर
उड़ती रही सहराओं में कहीं कभी
धुंधला आंखों की कफ़स को करती रही
चश्म-ए-नम आंखों की खासलत रखती भी
छिपाये दिल में कितने सवाल रखती है
वहीं जो खून-आब को गुलाल रखती भी
निखरती रही धूप की तपिश सह- सह कर
फूलों में जश्ने शबाब रखती भी
वो सीने में अख़्गर, आंखों में तुषार रखती है
बर्फ का सेक रखती हैं तुम्हारी गुज़री यादें भी
वो शंग आबेरवाँ -सा मिजाज रखती है
बंजर मिटटी हर बूँद सोखने का अंदाज़ रखती भी
शबनम को जलने दो के भाप तबियत में परवाज़ रखती है
चरम तक उड़, भाप बादली आभास रखती भी
बन फिर मेघदूत भ्रमण को निकलती है
और अंत में जा सकती हैं खुद में धरती भी ....
समुन्दर से पूछती की तुझ में मैं, कि मुझ में तू है
किसी आँचल में मेरे माथे की महक बसती भी
इस ममता के लिए कई ज़िंदगियाँ तरसती है
क्यों अब्रे आसमान से ज़मीन पे उतरती भी
शबनम की बूंदे सूखे पत्ते पे आ के रूकती है
रख सबर,अधजल गगरी सा क्यूँ छलकता है
सागर की लहरो सी क्यों वो मचली भी
उजले कोहसरों से फिसलती, पिघलती है
भृष्टि की हर बूँद क्यों प्यासी भी................
(~सहभागिता - आनंद खत्री , चारू अग्रवाल'गुंजन', अनिता शर्मा,फर्रुख नदीम,राजेश सिक्का,विकास त्रिपाठी,अंजली ओझा )
29/03/16

No comments:
Post a Comment