ज़िंदगी सिर्फ ख्वाइशों का पुलिंदा है
कुछ सिर्फ खलिश हैं, कुछ ज़िंदा है..
बिखरा धूप -सा यादों की छाँव में
कुछ दवा, कुछ ख्वाइश-कदा रिंदा है..
ख्वाब बुनता हूँ, डूब कर इश्क़ में
उड़ता रहता हूँ, जैसे कोई परिंदा है..
सो जाता हूँ, सूखे दरख्तों की छाँव में
लिए हसब-नसब की गठरी चुनिंदा है..
नित- नए ताने- बाने बुनता रहता है
ज़िंदगी ख्वाइशों का लिये पुलिंदा है...!!!
(~सहभागिता - आनंद खत्री ,अंजली ओझा ,प्रीती शर्मा ,चारू अग्रवाल,अनिता शर्मा, राजेश सिक्का ,विकास त्रिपाठी )
31/03/16

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