Wednesday, 3 August 2016

सहभागिता # 34 ज़िंदगी सिर्फ ख्वाइशों का पुलिंदा हैं



ज़िंदगी सिर्फ ख्वाइशों का पुलिंदा है
कुछ सिर्फ खलिश हैं, कुछ ज़िंदा है..

बिखरा धूप -सा यादों की छाँव में
कुछ दवा, कुछ ख्वाइश-कदा रिंदा है..

ख्वाब बुनता हूँ, डूब कर इश्क़ में
उड़ता रहता हूँ, जैसे कोई परिंदा है..

सो जाता हूँ, सूखे दरख्तों की छाँव में
लिए हसब-नसब की गठरी चुनिंदा है..

नित- नए ताने- बाने बुनता रहता है
ज़िंदगी ख्वाइशों का लिये पुलिंदा है...!!!

(~सहभागिता - आनंद खत्री ,अंजली ओझा ,प्रीती शर्मा ,चारू अग्रवाल,अनिता शर्मा, राजेश सिक्का ,विकास त्रिपाठी )

31/03/16


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