सह भागिता में लिखी गयी ये पक्तियां चित्रा देसाई जी को हम सब की तरफ से एक भेंट है। हम सबने उनकी कविता पढ़ कर सीखा और लिखा। (19/05/2016)
104 A--
अजीब से ख्वाब देखता हूँ मैं
कितने नादान दिख रहे है अभीवफा के सूख चुके दरिये में,
प्यार की मछलियों की चाहत में ,
जाल एहसास का डाले बैठे,
कितने तस्कीनजदा लगते हैं !!
अजीब ख्वाब देखता हूँ मैं !!
समंदर दौड रहा नदी की तरफ ,
कैसा मंजर ,अजीब बात है न !
सूरज आमादा रात से मिलने
रात चुप क्यों अजीब रात है न !!
अजीब से ख्वाब देखता हूँ मैं!!
चलती ट्रेन के रुकने पे जब उतरता हूँ
एक भी शख्स प्लेटफार्म पर नहीं दिखता !
और तो और फिर निकलने को बाहर,
एक भी दरवाजा रास्ता नहीं दिखता !!
अजीब से ख्वाब देखता हूँ मैं !!
तपते सहरे में बेसिम्त भाग रहा है कौन
और ये किसके पीछे भाग रहा हूँ मैं भी
किसकी तलाश जहन में यूँ तारी है कि
नींद मे होते हुये ऐसे जाग रहा हूँ मैं भी
अजीब से ख्वाब देखता हूँ मैं!!
किसी पहाड़ पर बारिश के पहले मौसम मे
किसी के साथ- साथ रोज भीग जाता हूँ,
कौन है वो, जो हकीकत में कहीं दिखता नहीं,
आँख खुलने पे तो वो चेहरा भी भूल जाता हूँ
आजकल अजीब से ख्वाब देखता हूँ मैं !!
ख्वाब में बारहा दिखती है मुझे एक नदी
और नदी के पार से आवाज एक आती है
जानी पहचानी सी दर्दीली शीरानी आवाज
अजीब बात तभी नींद टूट जाती है
इन दिनो अजीब से ख्वाब देखता हूँ मैं !!
(सुधीर पांडे "व्यथित ")
104B--
चार पल से
लदी हुई एक बैल गाड़ी
चाक के पहियों के
घिसे गुटिकाधार रंगीन
अपने ही अक्स में
मिली आँखों की सीढ़ियां
यादों के जाफरान मोहल्ले
गांव खलिहान मकान
तनहा-उधाडा भीड़ में
फ़ितरत-मशगूल अकेला
घूमता रहता हूँ
तुम भी कहीं हो शायद
इंतज़ार रहता है
जालों में फँसी ओस
धीरे-धीरे भाप बनकर
खिसकने का
पलटने पर भी
दीखता नहीं कोई
बस सरसराती पत्तियां
और गहरे दरख़्त
आजकल कुछ ख़्वाब अजीब देखता हूँ मैं...
(आनंद खत्री "सूफी बेनाम")
104C--
ख्यालों के पंछी
दिल के आसमान में
रोज़ नयी उड़ान भरते हैं
जहाँ की सभी दीवारों पे
रात दिन लगातार खुरचती रहती हैं
तेरा नाम कुछ यादें
नोंच कर फलक से सारे सितारों को
अपनी चुनर में सहेज रही हूँ मैं
और कभी तक कर रास्ता तेरा
आँखों से धूप सेंक रही हूँ मैं
थक कर कभी इन अनजाने रास्तों पर
घुटनों पे अपने ही सर टेक रही हूँ मैं
आजकल कुछ अजीब सपने देख रही हूँ मैं....!!!
(गुंजन अग्रवाल "चारू" )
(आनंद खत्री "सूफी बेनाम")
104C--
ख्यालों के पंछी
दिल के आसमान में
रोज़ नयी उड़ान भरते हैं
जहाँ की सभी दीवारों पे
रात दिन लगातार खुरचती रहती हैं
तेरा नाम कुछ यादें
नोंच कर फलक से सारे सितारों को
अपनी चुनर में सहेज रही हूँ मैं
और कभी तक कर रास्ता तेरा
आँखों से धूप सेंक रही हूँ मैं
थक कर कभी इन अनजाने रास्तों पर
घुटनों पे अपने ही सर टेक रही हूँ मैं
आजकल कुछ अजीब सपने देख रही हूँ मैं....!!!
(गुंजन अग्रवाल "चारू" )
104 D--
आजकल मैं अजीब सपने देखती हूँ खुद को ढूंड रही हू मैं कई सदियों से ..
हर शख्स शहर मे मेरे चेहरे सा है ..
तोड कर ज़ंजीर मैं जेल से भाग गयी ..
और खुद से ही खुद को पकड़ कर वापस ले आयी..
वो मुझे पिंजरे से आज़ाद कर रहा था ..
और मैं हूँ कि रिहाई से डर रही हूँ ..
मर गयी मैं
तो हँस रहे सब लोग ..
जी गयी
तो रोने लगे सब लोग ..
ये कैसे माँ बाप देख रही हू मैं ..
कोख में मर रही हू मैं
आजकल मैं अजीब सपने देखती हूँ ..
चाँद बुझा गया कोई
तारे तोड गया कोई
बादलों मे आकाशसीढी लगा के चढ़ रही हूँ
आजकल मैं अजीब सपने देख रही हूँ ..
(उत्कर्ष सिंह सोमवंशी )
104 E--
ख्वाबों में वो सावन के झूलेतुम और मैं
मैं और तुम
एक दूसरे में हुए गुम
सोचता हूँ तुम्हे पा ही लूंगा
अपना तुम्हे बना ही लूंगा
अभी तो ख्वाबो में ही सजते हो तुम
दिल में मेरे बसते हो तुम
हर बूँद में अक्स तुम्हारा
हर आहट पे आने का एहसास
जाने कब ख्वाब होंगे पूरे कब मिलेगा तुम्हारा साथ....
(राजेश सिक्का )
104 F--
जागती आंख ने देखा सपना ।
तितलियां पंख दे गईं मुझको ।
और सैय्याद बेरहम हो कर ।
मेरे पंखों को नोंच देता है ।
और सैय्याद बेरहम हो कर ।
मेरे पंखों को नोंच देता है ।
(सरोज सिंह परिहार "सूरज" )
104 G--
लहुलुहान सड़क
आती है ख्वाब में हर दिन
झाड़ियों में बिखरे कपड़ों में
बिलखती भागती...
चाक सा घूमता है
दिल में मेरे
फिर भी कोई सूरत
क्यूँ नहीं निकलती...
आती है ख्वाब में हर दिन
झाड़ियों में बिखरे कपड़ों में
बिलखती भागती...
चाक सा घूमता है
दिल में मेरे
फिर भी कोई सूरत
क्यूँ नहीं निकलती...
लबों पर थरथराती
शबनम की बूंदें
गुलाबी जलन
ख्वाब अधूरा
छूने का...
वो टुकड़ा अधूरे ख़्वाब का
अटका हुआ है मन में
किरचनों की कुरेदनी
से निकालने की कोशिश
धंसता जा रहा है
गहरे...और गहरे ...
आजकल कितने अजीब ख़्वाब देखती हूँ ना मैं...
(अनिता शर्मा "अनु")
( Rough Draft )
ख्यालों के पंछी
दिल के आसमान में
रोज़ नयी
उड़ान भरते हैं
चार पल से
लदी हुई एक बैल गाड़ी
चाक के पहियों के
घिसे गुटिकाधार रंगीन
जहाँ की सभी दीवारों पे
रात दिन लगातार
खुरचती रहती हैं
तेरा नाम कुछ यादें
अपने ही अक्स में
मिली आँखों की सीढ़ियां
यादों के जाफरान मोहल्ले
गांव खलिहान मकान
अजीब से ख्वाब देखता हूँ मै
कितने नादान दिख रहे है अभी
वफा के सूख चुके दरिये में,
प्यार की मछलियों की चाहत मे,
जाल एहसास का डाले बैठे,
कितने तस्कीनजदा लगते हैं !!
अजीब ख्वाब देखता हूँ मै !!
समंदर दौड रहा नदी की तरफ ,
कैसा मंजर ,अजीब बात है न !
सूरज आमादा रात से मिलने
रात चुप क्यो अजीब रात है न !!
अजीब से ख्वाब देखता हूँ मै.
चलती ट्रेन के रुकने पे जब उतरता हूँ
एक भी शख्स प्लेटफार्म पर नहीं दिखता !
और तो और फिर निकलने को बाहर,
एक भी दरवाजा रास्ता नहीं दिखता !!
अजीब से ख्वाब देखता हूँ मै !!!
तपते सहरे में बेसिम्त भाग रहा है कौन
और ये किसके पीछे भाग रहा हूँ मैं भी
किसकी तलाश जहन मे यूँ तारी है कि
नींद मे होते हुये ऐसे जाग रहा हूँ मैं भी
अजीब से ख्वाब देखता हूँ मै.
आजकल
मै अजीब सपने देखती हू
खुद को ढुड रही हू मै कई सदियों से ..
हर शक्स शहर मे मेरे चेहेरे सा है ..
तोड कर ज़ंजीर मै जेल से भाग गयी ..
और खुद से ही खुद को पकड़ कर वापस ले आयी..
वो मुझे पिजरे से आज़ाद कर रहा था ..
और मै हू कि रिहाई से डर रही हू ..
आजकल
मै अजीब सपने देखती हू .
मर गयी मै
तो हँस रहे सब लोग ..
जी गयी
तो रोने लगे सब लोग ..
ये कैसे माँ बाप देख रही हू "मै" ..
कोख मे मर रही हू मै ..
आजकल ...
मै अजीब सपने देखती हू
ख्वाब मे बारहा दिखती है मुझे एक नदी
और नदी के पार से आवाज एक आती है
जानी पहचानी सी दर्दीली शीरानी आवाज
अजीब बात तभी नींद टूट जाती है
इन दिनो अजीब से ख्वाब देखता हूँ मै
लहुलुहान सड़क
आती है ख्वाब में हर दिन
झाड़ियों में बिखरे कपड़ों में
बिलखती भागती
चाक सा घूमता है
दिल में मेरे
फिर भी कोई सूरत
क्यूँ नहीं निकलती
चाँद बुझा गया कोई
तारे तोड गया कोई
बादलों मे आकाशसीढी लगा के चढ़ रही हूँ
आजकल ..
अजीब सपने देख रही हूँ ..
ख्वाब का टुकड़ा
अटका हुआ है मन में
किरचनों की कुरेदनी
से निकालने की कोशिश
धंसता जा रहा है
गहरे
तनहा-उधाडा भीड़ में
फ़ितरत-मशगूल अकेला
घूमता रहता हूँ
तुम भी कहीं हो शायद
खवाबो में वो सावन के झूले
तुम और मै,
मैं और तुम
एक दूसरे में हुए गुम
सोचता हूँ तुम्हे पा ही लूंगा
अपना तुम्हे बना ही लूंगा
अभी तो ख्वाबो में ही सजते हो तुम
दिल में मेरे बसते हो तुम
लबों पर थरथराती
शबनम की बूंदें
गुलाबी जलन
ख्वाब अधूरा
छूने का
हर बूँद में अक्स तुम्हारा
हर आहट पे आने का एहसास
जाने कब ख्वाब होंगे पूरे कब मिलेगा तुम्हारा साथ
जागती आंख ने देखा सपना ।
तितलियां पख दे गईं मुझको ।
और सैय्याद बेरहम हो कर ।
मेरे पंखों को नोंच देता है ।
नोंच कर फलक से सारे सितारों को
अपनी चुनर में सहेज रही हूँ मैं
और कभी तक कर रास्ता तेरा
आँखों से धूप सेंक रही हूँ मैं
थक कर कभी इन अनजाने रास्तों पर
घुटनों पे अपने ही सर टेक रही हूँ मैं
आजकल कुछ अजीब सपने देख रही हूँ मैं
(अनिता शर्मा "अनु")
( Rough Draft )
ख्यालों के पंछी
दिल के आसमान में
रोज़ नयी
उड़ान भरते हैं
चार पल से
लदी हुई एक बैल गाड़ी
चाक के पहियों के
घिसे गुटिकाधार रंगीन
जहाँ की सभी दीवारों पे
रात दिन लगातार
खुरचती रहती हैं
तेरा नाम कुछ यादें
अपने ही अक्स में
मिली आँखों की सीढ़ियां
यादों के जाफरान मोहल्ले
गांव खलिहान मकान
अजीब से ख्वाब देखता हूँ मै
कितने नादान दिख रहे है अभी
वफा के सूख चुके दरिये में,
प्यार की मछलियों की चाहत मे,
जाल एहसास का डाले बैठे,
कितने तस्कीनजदा लगते हैं !!
अजीब ख्वाब देखता हूँ मै !!
समंदर दौड रहा नदी की तरफ ,
कैसा मंजर ,अजीब बात है न !
सूरज आमादा रात से मिलने
रात चुप क्यो अजीब रात है न !!
अजीब से ख्वाब देखता हूँ मै.
चलती ट्रेन के रुकने पे जब उतरता हूँ
एक भी शख्स प्लेटफार्म पर नहीं दिखता !
और तो और फिर निकलने को बाहर,
एक भी दरवाजा रास्ता नहीं दिखता !!
अजीब से ख्वाब देखता हूँ मै !!!
तपते सहरे में बेसिम्त भाग रहा है कौन
और ये किसके पीछे भाग रहा हूँ मैं भी
किसकी तलाश जहन मे यूँ तारी है कि
नींद मे होते हुये ऐसे जाग रहा हूँ मैं भी
अजीब से ख्वाब देखता हूँ मै.
आजकल
मै अजीब सपने देखती हू
खुद को ढुड रही हू मै कई सदियों से ..
हर शक्स शहर मे मेरे चेहेरे सा है ..
तोड कर ज़ंजीर मै जेल से भाग गयी ..
और खुद से ही खुद को पकड़ कर वापस ले आयी..
वो मुझे पिजरे से आज़ाद कर रहा था ..
और मै हू कि रिहाई से डर रही हू ..
आजकल
मै अजीब सपने देखती हू .
मर गयी मै
तो हँस रहे सब लोग ..
जी गयी
तो रोने लगे सब लोग ..
ये कैसे माँ बाप देख रही हू "मै" ..
कोख मे मर रही हू मै ..
आजकल ...
मै अजीब सपने देखती हू
ख्वाब मे बारहा दिखती है मुझे एक नदी
और नदी के पार से आवाज एक आती है
जानी पहचानी सी दर्दीली शीरानी आवाज
अजीब बात तभी नींद टूट जाती है
इन दिनो अजीब से ख्वाब देखता हूँ मै
लहुलुहान सड़क
आती है ख्वाब में हर दिन
झाड़ियों में बिखरे कपड़ों में
बिलखती भागती
चाक सा घूमता है
दिल में मेरे
फिर भी कोई सूरत
क्यूँ नहीं निकलती
चाँद बुझा गया कोई
तारे तोड गया कोई
बादलों मे आकाशसीढी लगा के चढ़ रही हूँ
आजकल ..
अजीब सपने देख रही हूँ ..
ख्वाब का टुकड़ा
अटका हुआ है मन में
किरचनों की कुरेदनी
से निकालने की कोशिश
धंसता जा रहा है
गहरे
तनहा-उधाडा भीड़ में
फ़ितरत-मशगूल अकेला
घूमता रहता हूँ
तुम भी कहीं हो शायद
खवाबो में वो सावन के झूले
तुम और मै,
मैं और तुम
एक दूसरे में हुए गुम
सोचता हूँ तुम्हे पा ही लूंगा
अपना तुम्हे बना ही लूंगा
अभी तो ख्वाबो में ही सजते हो तुम
दिल में मेरे बसते हो तुम
लबों पर थरथराती
शबनम की बूंदें
गुलाबी जलन
ख्वाब अधूरा
छूने का
हर बूँद में अक्स तुम्हारा
हर आहट पे आने का एहसास
जाने कब ख्वाब होंगे पूरे कब मिलेगा तुम्हारा साथ
जागती आंख ने देखा सपना ।
तितलियां पख दे गईं मुझको ।
और सैय्याद बेरहम हो कर ।
मेरे पंखों को नोंच देता है ।
नोंच कर फलक से सारे सितारों को
अपनी चुनर में सहेज रही हूँ मैं
और कभी तक कर रास्ता तेरा
आँखों से धूप सेंक रही हूँ मैं
थक कर कभी इन अनजाने रास्तों पर
घुटनों पे अपने ही सर टेक रही हूँ मैं
आजकल कुछ अजीब सपने देख रही हूँ मैं


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