खुले आसमां में परिंदे को देखो
कितनी बुलंद परवाज़ है इसकी
फ़रिश्ते ,इंसान और शैतान के नुमाएंदे देखो
आसमान पे हक बनाये हुए है
इंसा में जीने का जज़्बा जगाये हुए है
कुछ बोझ- सा भी परों पर उठाए हुए हैं
निकला है बच्चों की भूख मिटाने
या भटकते बादलों को रास्ता दिखाने
ऊँचा, ऊँचा और ऊँचा उड़ा जा रहा है
पंखों से सूरज ढके जा रहा है
अपनी क़ाबलियत से रूबरू करा रहा है
सात घोड़ों से दौड़ है उसकी
जैसे मज़हब से परे इन्सान को देखो
कैसे आपस में भाईचारा निभा रहा है..!
(~ सहभागिता - आनंद खत्री ,अंजली ओझा, राजेश सिक्का ,अनिता शर्मा , उत्कर्ष सिंह सोमवंशी, फर्रुख नदीम ,चारू अग्रवाल)
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