Friday, 12 August 2016

# 154 क्या यह पतझड़ की साँझ सखे

सह भागिता - हरिवंश राय बच्चन


"नीलाम के पल्लव टूट गये
मरकत के साथी छूट गए
अटके फिर भी दो पीत पात, जीवन डाली को थाम सखे
है यह पतझड़ की साँझ सखे" ~ हरिवंश राय बच्चन

कल फिल नव कोंपल फूटेंगी
कलिंयाँ फिर नवरस लूटेंगीं
यह शास्वत सत्य सृजन का है,मत समझो इसे विराम सखे
क्या यह पतझड़ की साँझ सखे

सूखे दिल पोखर कूल सभी
प्यासे पर अश्रु की धार सधी
निज चिंतन को यादें दो घट, जीवन कविता श्रृंगार सखे
क्या यह पतझड़ की साँझ सखे

मुझसे मेरा घट छूट रहा
व्याकुल मन भी यह रूठ रहा
क्यूं विरह अगन में जलते हैं,मेरे नयना दिन रात सखे
क्या यह पतझड़ की साँझ सखे।।

नव बसंत कल फिर आयेगा
मन में उल्लास जगायेगा
मत रोको इन अहसासों को,हैं यह सांस और प्राण सखे
क्या यह पतझड़ की साँझ सखे।।

जब साँझ का कलरव फूटेगा
मधुघट पर बेला महकेगा
जब चषक सधे लब पर लब हों , फिर क्यों ऐसा वैराग सखे
क्या यह पतझड़ की साँझ सखे

होते अधीर मुख कांति नहीं
जीवित है पर विश्रांति नहीं
सद्चिंतन अंगीकार करो,सुख-दुःख हैं बस परिधान सखे
क्या यह पतझड़ की सांझ सखे

जब ढली दोपहर जीवन की
मन मरुथल की तरूणाई के
इक अनजाने बंधन में तू , अब मत इस मन को बांध सखे,
क्या यह पतझड़ की सांझ सखे ।

सुरभित कर मन कलिकाओं को
आनंद की इन क्षणिकाओं को
कोमल भावों के धागे से, इक प्रेम डोर में बाँध सखे
क्या यह पतझड़ की साँझ सखे।

बढ़ा क़दम रुके नहीं
निशा में भी थके नहीं
कर असंख्य तू सृजन, यह वक़्त की पुकार सखे
क्या यह पतझड़ की साँझ सखे!!!

देह विटप से विलग पात
कोंपल बन आते पुनः साथ
फिर क्यूं कहते हो अंत प्रिये , यह सृष्टि का है चक्र सखे
क्या यह पतझड़ की साँझ सखे ?

क्या हुआ कल्पना गुमसुम है
क्या हुआ कोर दृग भी नम है
नजरे पथराई जैसी और हुई भावना बाँझ सखे
क्या यह पतझड़ की सांझ सखे

इस बेला में पाई उलझन!
अपने मन से होती अनबन!!
जीवन को धवल बना खुदको, अब अच्छे से दे माँज सखे
क्या यह पतझड की साँझ सखे

सायों की बढती लंबाई
और गहरी होती तन्हाई
इस रंगपटल पे चलते हैं, सतत बहुत से स्वांग सखे !!
क्या यह पतझड़ की सांझ सखे

~ गुंजन चारु अग्रवाल, शैलेन्द्र चौहान, अल्पना , सुधीर पाण्डे, सरोज सिंह परिहार , आनन्द खत्री (सूफ़ी बेनाम)



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