तरकश में रच ख्याल बसी थी
तुमको पाने की हर ख़्वाहिश
छल धार तीर ले तरुणी थी
क्या है बाकी कोई गुंजाइश
तनी कमानी भवें चलानी थी
रख रहीं हैं एक फरमाइश
रिश्ता रिश्ता भटक रही थी
डोर बंधी उम्मीदों की गर्दिश
इस तलाश का अंत नहीं अब
कहो क्या आखरी आजमाइश
तीर लगे फिर जाँ क्यों नहीं जाती
किसकी दुआओं की है गुज़ारिश..
(~सहभागिता - आनंद खत्री, चारू अग्रवाल,अंजली ओझा,राजेश सिक्का,फर्रुख नदीम,विकास त्रिपाठी )
01/04/16
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