हे ! बोगनविलिया तेरी रंगीन दोपहरी
थक कर हवा तेरे घने से साए में ठहरी ..
इतनी धूप है फिर भी तेरी रंगत गहरी !!
बोलगी अब बहुत जोर से याद -टिटहरी..
खिला फूल- सा देखो यहाँ हर शाख -पत्ता भी
सूखी धुप में भी रंग-ओ-ख़ुशी है बिखेरी..
घर के दरवाज़े पे पुरखों की अब भी प्रहरी
अलमस्त नवोढ़ा, बिखरे यौवन देहरी..
अब भी लगती है काग़ज़ के फूलों जैसी
गाँव लौटकर तेरी वो बातें शहरी..
साए में तेरे बैठना भी पुरसुकून है
सुनकर बुजुर्गो की नसीहते गहरी..
कांटे, ठूंठ पात -दर -पात श्रृंगार वल्लरी
रंगीन लहरिया पहन नाचता भर दुपहरी..
बोगनविलिया जरा सा सुन तो ले री
कितने अरमान जगाती निःस्तब्ध दोपहरी..
तृप्त क्षुधा बाद आती दिन नींद सी प्यारी
हवा का झोंका, थकावट और ये खुमारी..
हे ! बोगनविलिया तेरी रंगीन दोपहरी...!!!
(~ सहभागिता~ सरोज सिंह परिहार ,सुधीर पांडे ,आनंद खत्री,उत्कर्ष सिंह सोमवंशी,फर्रुख नदीम,राजेश सिक्का,अनिता शर्मा )
17/04/16
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