Saturday, 23 April 2016

सह-भागिता #3 - दोस्त कहता था जो भरे बाजार में



दोस्त कहता था जो भरे बाजार में


आज पत्थर है उसके हाथ में





खता क्या हमारी हुई कह दो

शाम टूटी विसाल-ए-इंतज़ार में





नम हुई आँखें मेरी चलते चलते
ज़हर है हवा ए शहर-ए-अज़ाब में

पूरी सांसों से परहेज़ करने लगा
जी रहा टूटी हुईअधूरी आस में

होगी कभी तो आरजू पूरी तेरी
झूठा दिलासा ही किसी बयार में

क्यों दिल कुछ भर सा जाता है
अक्स बिखरा है मेरे किरदार में

मैं आसमान के तारों सा सजा लूँ
भींगी पलकों छुपा लूँ अखबार में

अब वो रोकता भी नहीं मुझको
दुश्मनी भूल गया बज़्म-ए-यार में

मैं हूँ उसमें, या वो मुझमें समा जाता है
अंधा रहता हूँ एक अफ़रोज़ बेदार में


~ सह-भागिता (गुंजन अग्रवाल 'चारू' ,विकास त्रिपाठी, अंजलि ओझा,अनिता शर्मा, आनन्द खत्री, राजेश सिक्का )
13/03/16



सह-भागिता #2 - वो पैमाना मेरी ग़ज़ल का था



वो पैमाना मेरी ग़ज़ल का था
मैं डूबता गया जाम चढ़ता गया

छलक कर रूह मेरी भीगी
वो शख्स भी अजीब बनता गया

हाथ से छूते ही छलक गया
लकीरों में छिपा मिसरा भिगोया गया

वो शराब से ग़ज़ल कहता रहा
तरन्नुम में ज़िक्र साक़ी का आता गया

होश हो तो होश की बात करें
फलक तक मदहोश ज़िक्र गया

अखतरों से भीगी रातों का सुरूर
तिलस्म उसकी बात खोलता गया

नशे में डूबी नशीली सी दो आँखें
मयखाना लिखा दीवान हो गया

अनकहे किस्से बताना छोड़ कर
छेड़ नज़्म ज़िक्र आशिकाना गया

ज़ुल्फ़ की छाओं से अब्र बरसाकर
बिंदी पेशानी पे सूरज जल सा गया

इंतज़ार की ये लम्हा गुज़र जाए ज़रा
वक्त तो हर लम्हे की किस्मत लिख गया


~ सह-भागिता ( आनन्द खत्री, अंजली ओझा,अनिता शर्मा , उत्कर्ष सिंह सोमवंशी,विकास त्रिपाठी, गुंजन अग्रवाल 'चारू' , )


12/03/16




सह-भागिता #1 - कच्ची मिटटी से ख्वाब बनाएंगे



धूप को तह लगा के रख देना
कच्ची मिटटी से ख्वाब बनाएंगे

कुछ देर हम छाँव में बिताएंगे
वरना नये घरौंदे बिखर जायेंगे

अंजाम के सांचे में ढलका देना
बारिशों में जो पुतले घुल जायेंगे

या हवा के धोखे में जो आये
रेत बन के कभी तो उड़ जायेंगे

टूट टूटकर फिर जुड़ने जो आये
जिंदगी की तपिश से मिटटी सुखायेंगे

सूखे पत्ते, टूटे मकान, हवा अँगुलियों के निशान
वक़्त के साथ सब मिट जायेंगे

बचेंगी कुछ यादें कुछ टूटे जाम
ज़हन की दीवारों से जो टकराएंगे

तुम यूं टुकड़े समेटना खत में
ज़िंदगी लिखना हम मौत से निबट आयेंगे

नज़र कर देना उसको ज़र्रों के
आंसुओं के नुख्ते भी बिठाएंगे

पढ़ना मौसम के इस आवारापन को
मिटटी में सौंधी खुशबू जगायेंगे

रोशन करे रूह को जो लौ उसे
जिस्म की आग से दिये सजायेंगे

बुझ के वो आग महबूब जो मिट्टी हुई
उस बुझी मिटटी से पैमाना बनाएंगे

तेरे बाद नया इश्क़ शराब हुई
जिन्दगी की भट्ठी पे उसे सुलगायेंगे

मैकदों के झूठे पैमानों से ख्वाब
उन्हीं में डूब के हम शाम बुझाएंगे


~ सह-भागिता (आनन्द खत्री,विकास त्रिपाठी, अंजलि ओझा, अनिता शर्मा, उत्कर्ष सिंह सोमवंशी, गुंजन अग्रवाल 'चारू' )


12/03/16


Tuesday, 19 April 2016

Q. What is Seh- Bhagita सह -भागिता क्या है?
A. This is a meditative exercise in thinking with  people, for better synergy. We participate in building a succession of thoughts.
ख्यालों की कतार है, जिसमें  सिर्फ एक ख्याल अपना है।  दूसरों के कहे से जुड़ कर ख्याल लिखना।


Q. How is thought exercise practiced. इसको कैसे लिखा जाये ?
A. We write on a given que. Build the thought, making it intense and sweet.
हर दिन एक ख्याल शुरू किया जाता है, जैसे घर की पहली ईंट। उसपे ईंट जोडें, उसे सुन्दर और तीव्र बनायें। सह-भागिता में ख्याल का सामंजस्य रखने वाले सह-भागी होते हैं, जो साथ मिल कर ख्याल की रचना करते हैं। एक व्यक्ति जैसे सुबह एक ख्याल (बीज) ज़मीं पे गिरा दे तो उसके बाकी साथी मिल कर उस ख्याल को शाम तक एक पौधा बना देते हैं ।


Q. What does it lead to. इससे क्या होगा ?
A. It will make us better thinkers, more tolerant and better listeners and poets.
हम बेहतर सोचने , सुनने समझने वाले इंसान बनेंगे।


Q. Why only one line. सिर्फ एक पंक्ति का ख्याल क्यूँ ?
A. Because the art is to say a lot in a few words.
अक्सर ही कविता में एक पंक्ति पूरी कविता का भार उठाती ही और कम शब्दों में बहुत कुछ कहना ही कला है।


Q. How does a que end. ये पंक्तियां खत्म कैसे होती हैं
A. It ends at the end of a day. One of the members edits it.
ख्याल को शुरू करने वाला दिन खत्म होने पर उनको संजोता है , थोड़ा सम्पादित कर के पोस्ट करता है


Q. Where does it lead. हम कहाँ पहुंचना चाहते हैं ?
A. Poets are egoists. They hold thought, feel as if it belongs to them.
Thought like matter does NOT belong to anyone.
So it is always advised that we as poets give up thought and stay clean.
It is an invitation for all poets and literature enthusiasts to be with us meditatively, without judging. Seh-Bhagita will evolve as thoughts carry synergy.
कवि अक्सर अहंवादी होता है।  उसको ऐसा लगने लगता है कि ख्याल को जन्म वो देता है।
ख्याल- वज़न रखने वाली एक वस्तु है, जो इस संसार में पहले से थी।
आध्यात्म कहता है ख्याल छोड़ो और मन से साफ़ रहो।
तो इस ख्याल को सजा के छोडते हैं।
आइये चिंतनशील हो के, लय मिला के लिखते हैं , सह-भागिता।