दोस्त कहता था जो भरे बाजार में
आज पत्थर है उसके हाथ में
खता क्या हमारी हुई कह दो
शाम टूटी विसाल-ए-इंतज़ार में
नम हुई आँखें मेरी चलते चलते
ज़हर है हवा ए शहर-ए-अज़ाब में
पूरी सांसों से परहेज़ करने लगा
जी रहा टूटी हुईअधूरी आस में
होगी कभी तो आरजू पूरी तेरी
झूठा दिलासा ही किसी बयार में
क्यों दिल कुछ भर सा जाता है
अक्स बिखरा है मेरे किरदार में
मैं आसमान के तारों सा सजा लूँ
भींगी पलकों छुपा लूँ अखबार में
अब वो रोकता भी नहीं मुझको
दुश्मनी भूल गया बज़्म-ए-यार में
मैं हूँ उसमें, या वो मुझमें समा जाता है
अंधा रहता हूँ एक अफ़रोज़ बेदार में
~ सह-भागिता (गुंजन अग्रवाल 'चारू' ,विकास त्रिपाठी, अंजलि ओझा,अनिता शर्मा, आनन्द खत्री, राजेश सिक्का )
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