Sunday, 24 April 2016

सह-भागिता #16 - जिंदगी रंग लो अपनी होली के रंग से





जिंदगी रंग लो अपनी होली के रंग से
शोख़ चल रही है बयार फ़ागुन के संग से

रंगो, गुजिया, और भंग से,
मिलेंगे जब मेरे रंग तेरे रंग से,
रंग भरी आँखों में ख़याल से,
उड़ते गुलाल और रंग भरी फुहार से,
तेरे गालों में लगाना गुलाल बड़े प्यार से....

माल पुओं की चाशनी के ख्याल से,
जलेबी की तरह उलझी ज़िन्दगी के मलाल से,
रंग-ए-हसरत पान में किमाम से,
या रंगों में डूबी हर इक शाम से,
ख़ूब मीठी गुझिया और ठंडाई के जाम से....

सफेद चुनर को लहरिया बनाने से,
अंतर्मन को अपने भिगाने से,
भीग के फिर निखर जाने से,
छोड़ गए जो उनके न लौट आने से,
कहने, सुनने और मनाने से,
गुज़रे किस्सों को भूल जाने से....
दुश्मनों को अपना बनाने से....

धूप की इक बूँद के अल्हड़ छिटक जाने से
इन्द्रधनुष रंगों के ज़मीं पे उतर आने से,
उसको भींगाने और भींग जाने से,
मेरे गम में तेरी ख़ुशी से ख़ुशी...
ये समझने-समझाने से...
होली होती है, अपनों के करीब आने से...







(सह-भागिता - आनंद खत्री, विकास त्रिपाठी, राजेश सिक्का , गुंजन अग्रवाल 'चारू' , अनिता शर्मा, अंजलि ओझा, रिपुदमन मगों )


20/03/16

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