वजह मिलती नहीं हर रोज़ मिलने की,
ढूंढा करती हूँ तुमको ज़हन के रास्तों पर...
इस खोज को दिन का शौक बना बैठे हैं,
कभी रातों को जाग कर कभी तारे गिनकर
खुली आँखों से सोती हूँ तुम्हारे दीदार को
कुछ पल को भूल जाने का जी करता है ...
इन तैरते हुए ख्वाबों को कैसे रोकूँ बहने से
हर ख्वाब मेरा तुझ तक सफर करता है
ढूंढता है पगडंडियों पर तेरे निशान
न पा तुझे, बच्चों सा मचलता है
जिद्द है कैसी तुझे हासिल करने की
इस जस्ब को सलासिल बता गया कोई
ये दिल सिर्फ तेरे लिए ही धड़कता है....
फिर चला जाएगा छोड़ तुझे
ये वहम क्यों आता है दिल में
तू भी तो कभी बहला मुझको
अपनी आँखों में बसा मुझको
(सह-भागिता - गुंजन अग्रवाल 'चारू' , आनंद खत्री, अनिता शर्मा, राजेश सिक्का, विकास त्रिपाठी, अंजलि ओझा)
15/03/16
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