एक आग सी है सीने में
जलती रही हरदम, बुझती नहीं...
खहिशों के तलातुम सी
सुलगती है, पर मचलती नहीं
सहज है, पर सुलझने में
बीतती है, बिसरती नहीं...
दरिया न बन जाये शोलों का कहीं
नब्ज़ देख चरागार उदास भी नहीं
एक ग़ुबार सा कुछ उठता है
इस दर्दे दिल की दवा भी नहीं
लगता है उसे न परवाह थी कभी
टूटा है जो अंदर, वो चुभता भी नहीं...
ढूंढता हूँ, पर दिखता क्या कभी
दिल-ए-आवाज़ हूँ, वो सुनता भी नहीं...
बन खुशबु महकता है मुझमें कभी,
तेरी यादों का, गुलदस्ता भी नहीं....
चाहे जब चुरा लो मुझसे,
सब तेरा है मेरा कुछ भी नहीं...
एक आग सी सुलगती है सीने में
पर धुंए के परे, कुछ भी नहीं.........
(सह-भागिता- विकास त्रिपाठी, गुंजन अग्रवाल 'चारू' , राजेश सिक्का, आनंद खत्री, अनिता शर्मा)
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