Sunday, 24 April 2016

सह-भागिता # 28 - बरगद की भांति खुद से खुद को उपजाता है मर्द



बरगद की भांति खुद से खुद को उपजाता है मर्द


ज़मीन को अपनी जड़ों से पकड़ता है मर्द

थोड़ा थोड़ा सबमें बंटता रहता दिनभर है मर्द
किसी बीज में सुपत प्रकृति के गर्भ में है मर्द
धुप में बरगद की छाओं सा फैला है मर्द
काष्ठ खोल नारियल बन भीतर तरलता है मर्द
सबको बाँहों में समेटे सुख का एहसास है मर्द
सख्त छाल, कम बाल, बल, और प्रतिकार है मर्द
बरसों तक बिना डिगे खड़े रहने का एहसास है मर्द
माँ का लाल, किसी का प्यार, दिलदार है मर्द
मन में दफनाए सैकड़ों दर्द और विचार है मर्द
शक्ति का शिव, प्रकृति को पुरुष है मर्द
सख्त रहे आसमां सा बादलों सा न बरस पाये है मर्द
कहने को कई बाते पर बिना कहे चुप रह जाए है मर्द
दिल में भरा सागर कभी आँखों से न छलकाए है मर्द
सब कुछ सहकर भी हमेशा मुस्कुराये है मर्द
इश्क़ में कैस, साहित्य को साहित्यकार है मर्द
अपने अंदर की औरत को छुपाये रहता है मर्द
मर्द होने के अहम में कभी कभी इतराये है मर्द
कविता का मात्रभार सौंदर्य का अधिकार है मर्द
सास - बहू की तुला साधता, मध्यस्थ है मर्द
नदी को तल, सूक्ष्म का साकार है मर्द
नटखट नज़र से सौन्दर्य पान को ललचाता है मर्द
महोब्बत में भी नहीं कभी सुधर पाता है मर्द
कभी-कभी मर्यादा पुरुषोत्तम भी बन जाता है मर्द
गोपियों का गोपाल, यशोदा का नन्दलाल मर्द
हीर का राँझा कभी सोहनी का महिवाल है मर्द
नर में नर, स्त्री का स्वयंवर-श्रृंगार है मर्द
हर ऋतुओं से लड़ता आगे बढ़ता जाता है मर्द
औरत का पालनहार हर आसार है मर्द
ब्रह्मा, विष्णु, महेश का अवतार है मर्द
कोमल वल्लरी को सख्त भुजाओं में थामता है मर्द
बनारसी सिल्क को साथ खद्दर-सूती-कुर्ते में है मर्द
लिये शीश हाथ रणभूमि की तलवार है मर्द
वक़्त आने पे भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, है मर्द
बाढ़ में बहने से जो रोके वो शिला वो चट्टान है मर्द
मांझी बन चट्टानों में रास्ता बना सकता है मर्द
लाठी, ऐनक, राखी, सिंदूर, शाना, है मर्द
कुछ रोता हुआ कभी कमज़ोरी छुपाता भी है मर्द





(सह-भागिता - आनंद खत्री, अनिता शर्मा, राजेश सिक्का, गुंजन अग्रवाल 'चारू', फार्रुख़ नदीम, विकास त्रिपाठी)


26/03/16


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