Saturday, 23 April 2016

# 61.d. गुलज़ार साहब की कविता : "ये कैसी उम्र में आ कर मिली हो तुम" पे सह भागिता का अनु-नाद - ४. गुंजन अग्रवाल 'चारू'




ये कैसी उम्र में आकर मिली हो तुम

जीवन के इस अंतिम पड़ाव में...

याद है तुमको वो मोड़

जहाँ से बिछड़े थे कई तूफां दिल में समेटे

बीते वक़्त के दरीचों से

तुम्हारा वो मुस्कुराता चेहरा

अब दिखाई नहीं देता

बस तुम्हारी कुछ खुरदरी सी यादें हैं

जो आज भी चुभ जाती हैं

मेरे ज़हन की मखमली दीवारों पर

मेरे वजूद की टेढ़ी मेढ़ी मेड़ों पर

तुमने जो पगडंडियां बनायीं थीं

तुम्हारे पैरों की छाप

आज भी है वहां पर...

ये अब कैसी उम्र में आकर मिली हो तुम

जहां हर आती सांस हर जाती सांस पर भारी है

तुमसे बिछड़ने का मातम

आज भी जिस्म की रग रग में जारी है

सूख गया है पौधा उम्मीदों का

तुम्हारी यादों वाला हिस्सा अब कितना खाली है

क्यूं अब इस मोड़ पर आकर मिली हो तुम?




............ चारू...........


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