Saturday, 23 April 2016

# 61 b. गुलज़ार साहब की कविता : "ये कैसी उम्र में आ कर मिली हो तुम" पे सह भागिता का अनु-नाद - २. उत्कर्ष सिंह सोमवंशी



ये कैसी उम्र मे आ कर मिली हो तुम


कैसे चन्द लमहों मे समेटूँ सब कुछ ..


अश्क़ ए तवातुर मे मैने कैसे बितायी सदियाँ ..


हसरतें ए परवाज़ लिये कैसे कटी है रतियाँ ..


तुम जो होती दम-साज तो कैसा होता


इस बात को सोचूँ तो फिर एैसा होता


सहर तेरी तो रात मेरी होती


इश्क तेरा मुझपे खुदा साज होता


ग़म्जा आखो पे तेरी नज़्म मै करता रहता बिखर कर


ढूडती रही आँखे जिसे सदियो


मताये जान कहा थी बहुत अनमोल थी तुम ...


कहूँ भी क्या कि ये कैसी उम्र मे आ कर मिली हो तुम ..


तुम्हारी राह मे जो मैने हज़ारों फूल पाले थे ..


गए सुखे मे मेरे फ़ातिहे मे काम आये वो.






~ उत्कर्ष



No comments:

Post a Comment