Sunday, 24 April 2016

सह-भागिता #19 - मैं तन्हा चाँद, तुम पूरा आसमान



मैं तन्हा चाँद, तुम पूरा आसमान
उफन रहा है बादलों में रूमान

बिखरे है मोती पिरो रहा हूं माला
बना के तस्बीत नाम लूँगा आला

हबीब सा हूँ, न समझे रकीब कोई
तेरा ग़मगुशार , तेरा तबीब कोई

जुगनुओं के साथ भेजी है चिट्ठी यहाँ
कोई दिलदार रहनुमा हो वहाँ

तुम जवाब में खुशबु से लिखना कलाम
आ रहा है तूफान, अब पढ़ लेना पैग़ाम

दिल की सरहदों को क्या पहरे, लगाम
यायावर है, उसका कब एक मुकाम

अंजान सी बारगाह में पेश मेरा भी सलाम
सुना है, है एक दोस्त तुम्हारा बेनाम

हुस्न वालों ने कर रखा है मोहब्बात को इनाम
मिलेगी मोहोब्बत तभी होगा शहर में नाम

या कि गुमनाम रह ले, कुछ तो पर्दादारी हो
फिर से हो ना जाए कोई शायर बदनाम...


(सह-भागिता - आनंद खत्री , रिपुदमन मागों, अनिता शर्मा, अंजलि ओझा, मो.शब्बीर , राजेश सिक्का )


21/03/16





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