यादों से कहो अपनी,
इबादत के वक्त तो ना सताए
खुदा को दूर रहने दे
ज़्यादा पास न लाए
खुदा में तू है, या तुझमें खुदा
ये भ्रम हमेशा सताए
सजदों में तेरे इतना दर्द,
पथराई आँखों थोड़ा तो भीग जाए
जुबां पे खुदा का नाम लाया नहीं
आये तुम्हारे ही दर पे सर झुकाए
तेरी रज़ा है, मार दे या तार दे,
क्या पता ख़ुदा बचाने घर आ जाए
ऐसी ही कारीगरी से वो भी बना खुदा है
नाम लबों से जुदा न हो, चाहे हम फ़ना हो जाएं
फुर्सत नहीं रहती तुम्हें है आज मिलने की
कयामत के दिन तो मिलोगे, ये वादा हो जाए
मुझसे मिलने को शायद वो भी बेकरार हो जाए,
गुमराह हैं जो सालों से उन्हें घर बार मिल जाए,
इन तरसती हुई आँखों को, अब क़रार मिल जाए....
शायद... मुझे मेरा यार मिल जाए....
(सह-भागिता - आनंद खत्री,अंजलि ओझा,अनिता शर्मा, राजेश सिक्का, गुंजन अग्रवाल 'चारू', विकास त्रिपाठी, प्रीती शर्मा)
19/03/16
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