फिर आग लगी है गुलशन में
धूं-धूं कर जलते नशेमन में
भवरों कि ये सियासत है,
जो ज़ाहिर दिखता है ख़िरमन में.
कोई सहलायेगा काँटों को
ये वहम बुझा देना मन से...
मोहब्बत को तालीम मे बाँधो तो
कुछ दाग़ सजा लो दामन में.
तुम राह ढूँढना उस लौ की
जो रातों में जलता अख्तर हो...
या तुलसी के चौबारे पर
इक दिया जला हो आँगन में...
है ख़ुमार तुम्हारे इरादे पर
या धुंए का पर्दा आँखों पर...
बस आंसुओं से धुला कब है
जो दाग लगा हो दामन पर....
यूँ गुलों के आशिक़ हो कर भी
हर तमन्ना से जुदा हम हैं...
बस ज़िक्र किया था खुशबु का,
तिमिर के गुनहगार क्या हम हैं...
~ सह-भागिता (आनंद खत्री, उत्कर्ष सिंह सोमवंशी, अनिता शर्मा, राजेश सिक्का)
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