Saturday, 23 April 2016

सह-भागिता #2 - वो पैमाना मेरी ग़ज़ल का था



वो पैमाना मेरी ग़ज़ल का था
मैं डूबता गया जाम चढ़ता गया

छलक कर रूह मेरी भीगी
वो शख्स भी अजीब बनता गया

हाथ से छूते ही छलक गया
लकीरों में छिपा मिसरा भिगोया गया

वो शराब से ग़ज़ल कहता रहा
तरन्नुम में ज़िक्र साक़ी का आता गया

होश हो तो होश की बात करें
फलक तक मदहोश ज़िक्र गया

अखतरों से भीगी रातों का सुरूर
तिलस्म उसकी बात खोलता गया

नशे में डूबी नशीली सी दो आँखें
मयखाना लिखा दीवान हो गया

अनकहे किस्से बताना छोड़ कर
छेड़ नज़्म ज़िक्र आशिकाना गया

ज़ुल्फ़ की छाओं से अब्र बरसाकर
बिंदी पेशानी पे सूरज जल सा गया

इंतज़ार की ये लम्हा गुज़र जाए ज़रा
वक्त तो हर लम्हे की किस्मत लिख गया


~ सह-भागिता ( आनन्द खत्री, अंजली ओझा,अनिता शर्मा , उत्कर्ष सिंह सोमवंशी,विकास त्रिपाठी, गुंजन अग्रवाल 'चारू' , )


12/03/16




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