Sunday, 24 April 2016

सह-भागिता #14 - ग़ज़ल में रूबरू है हसरतों के साये



ग़ज़ल में रूबरू है हसरतों के साये
साया को धूप भी हो कोई पिघल जाए
जाए ही क्यूँं, गर सुकूँ तेरी बाँह में आए...
आए न फिर वो मौसम सुहाना आये
सुहाने सफर को जायज़ ठिकाना
ठिकाने ढूँढ़ते ये आशिक़ पुराना आये
पुरानेपन का नज़राना कुछ तसवीरें
तस्वीरें में ही बची न यादें सिमट जायें
यादों ने रखा है हमें ज़िंदा उम्र के लिये
उम्र कहीं सांसों में न बिखर जाये
बिखरे से सावन पे बहकें तेरी बाहें
बाहों के हार जो गले में डल जाये
डाल नज़र का पहरा, मुड़कर ना देखें...
देखे जो औरो को मैं बिखर जाऊ...
जाऊं कहाँ अब तेरे बिन मैँ कहाँ जाऊं...


(सह-भागिता - आनंद खत्री, अनिता शर्मा, राजेश सिक्का, विकास त्रिपाठी, गुंजन अग्रवाल 'चारू' )


(Rule was to pick the any word of the previous line)


19/03/16


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