#33
दिल में ऐसे ठहर गये हैं गम
कुछ बेघर रिश्तेदार पुराने
दहलीज़ पे किवाड़ खटखटाते
झुर्राए सायों के चेहरे
नींद सुलाते ख्वाब थपकियाँ
करवट रात खोजती सिलवट
जुल्मत अकेले मन कोने में
आह चढ़ी यादों की शिरकत
दस्तक हैं सांसें धुकनी पर
बुझाती जलन पुतली झपककर
गीली लकड़ी धुंआ बिखेरे
गुलबांग सबा चूमती हसरत
दिन चढ़ती गुल-ए-ज़ार दिक्कतें
उम्र गुज़री तनहा इस कदर
#36
जैसे जंगल में शाम के साये
अँगुलियों से गुदे
रेतीले अल्फ़ाज़ों पे
धूल हुई ग़ज़ल उड़ाते
रश्क़ लम्हों की उड़ान, गुबार
किरकिरी कुनमुनाती परवाज़
भारी पलकों पे पिघला काजल
आरास्तगी अमावस रात
उड़ता आँचल ढील पकड़ से
पत्ते फिसलते पेड़ के हाथ
बिखरे जंगल सूखे मधु-कोष
चांदनी के छूने से जल उठा
नीरवता में खग-डैनों का शोर
#38
जाते जाते सहम के रुक जायें
गुज़रे वक़्त को पुलिंदे में बांधे
लम्हे एक लम्स का हिसाब मांगते
रंग -ए-बू की हिरासत में निखार
लरज़ते लकीरों में मुकम्मल होने को
किरमिच की कुलबुलाहट
मंजुल साया अमल होने को
हरदम बरहम दर-बदर भटकता
कभी रुकता बैठता और फिर चलता
#41
मुड़के देखें उदास राहों पर
किसी सुस्त मोड़ पे उलझे
कुछ सूखे पत्ते बाट जोहते
हवा के किसी कतरे का
सुगबुगाहट है आने की वहीं से
तुमसे जुदा हुए थे जहाँ
शाम की बुझती मुस्कराहटों से
छंटता नहीं धुंआ
तुम्हारी ही बातें करते रहे
बूढ़ी नज़रें इंतज़ार इन्तेहाँ
बताते तुम हो खुशनुमा
ये उदास रहें और ये समां
#44
कैसे बुझते हुए उजालों में
जगर-मगर अँधेरा सा है
सायों को दूर करती शाम
घरोंदों को बढ़ते बेदम कदम
सांझ की लिपटी चादर
अल्साये रास्ते और उलझन
शायद तम को ग़र्क़ तक खंगारता
ज़िन्दगी का गाँठ लगा सिरा
ढूंढता दूर कहीं मेरा हमदम
#46
दूर तक धूल ही धूल उड़ती है
किन -किनाने लगी हैं आँखें
फिर गुज़रा गुबार-ए-लश्कर शायद
नज़र अंजाम तक न पहुंची पर खूब रहा
गिर्दाब में ज़इफ़ वो घूम रहा
सूरज नज़रें ढक के बैठा शायद
ये वो दयार नहीं जिसे मंज़िल कहें
धूल जुड़ी बसती कोई मेयार नहीं
(सह -भागिता - अनिता शर्मा , अंजलि ओझा , उत्कर्ष , गुंजन अग्रवाल 'चारू' , विकास त्रिपाठी , राजेश सिक्का , सूफी बेनाम )
(किरमिच - canvas) (कुलबुलाना -कुछ कहने को व्यग्र) (गर्क़ - drown as in bera-garq) (गिर्दाब - बवंडर,ज़'इफ़ - असहाय) (मेयार- status) (आरास्तगी - decoration)
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