Sunday, 24 April 2016

सह-भागिता #20 - देखते हैं, सोचते हैं पर अब दिल से काम नहीं लेते



देखते हैं, सोचते हैं पर अब दिल से काम नहीं लेते
सरेआम महफ़िल में अब उनका नाम नहीं लेते...

भूलते हैं ख्वाब में उनको हम कभी- कभी लेकिन ,
खोकर याद में उनकी मगर अब जाम नहीं लेते...

साथ चलने को रास्तों में धूप- छाँव न भी हो तो भी ,
ठहर कर हम दरख्तों का कभी एहसान नहीं लेते

बेनामी ओढ़ ली है हर तरफ के अंजाम की तरह,
अब हम किसी का दिल कभी एहसान नहीं लेते...

आईने में देख अक्स अपना तुझे पहचानते हम हैं
तेरी बेदिल अदाओं से कोई इलज़ाम नहीं लेते

चिराग़े सहर के बूते रहोगे कब तक जलोगे तुम
ये बात मेरी तुम क्यों कभी मान क्यों नहीं लेते...

देखो दिनों में शराफ़त की धूप उग आती है आज कल
जुगनुओं से रौशनी क्यों अब कभी उधार नहीं लेते

अफ़सोस रहेगा जब सोचोगे आइन्दा फिर कभी
गिरते हुए को चाहत से अब संभाल क्यों नहीं लेते

माज़ी अब बहुत रुलाता है ज़िंदगी हार क्यों नहीं देते
आइन्दा के तलातुम से कश्ती निकाल क्यूँ नहीं लेते

सुना है अदा से फिर मेरा नाम पुकार पूछता है कोई
अपने अंदर के "मैं" को हम सब मार क्यों नहीं लेते


(सह-भागिता - गुंजन अग्रवाल 'चारू' ,आनंद खत्री , अनिता शर्मा,राजेश सिक्का , विकास त्रिपाठी )


22/03/16



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