धूप को तह लगा के रख देना
कच्ची मिटटी से ख्वाब बनाएंगे
कुछ देर हम छाँव में बिताएंगे
वरना नये घरौंदे बिखर जायेंगे
अंजाम के सांचे में ढलका देना
बारिशों में जो पुतले घुल जायेंगे
या हवा के धोखे में जो आये
रेत बन के कभी तो उड़ जायेंगे
टूट टूटकर फिर जुड़ने जो आये
जिंदगी की तपिश से मिटटी सुखायेंगे
सूखे पत्ते, टूटे मकान, हवा अँगुलियों के निशान
वक़्त के साथ सब मिट जायेंगे
बचेंगी कुछ यादें कुछ टूटे जाम
ज़हन की दीवारों से जो टकराएंगे
तुम यूं टुकड़े समेटना खत में
ज़िंदगी लिखना हम मौत से निबट आयेंगे
नज़र कर देना उसको ज़र्रों के
आंसुओं के नुख्ते भी बिठाएंगे
पढ़ना मौसम के इस आवारापन को
मिटटी में सौंधी खुशबू जगायेंगे
रोशन करे रूह को जो लौ उसे
जिस्म की आग से दिये सजायेंगे
बुझ के वो आग महबूब जो मिट्टी हुई
उस बुझी मिटटी से पैमाना बनाएंगे
तेरे बाद नया इश्क़ शराब हुई
जिन्दगी की भट्ठी पे उसे सुलगायेंगे
मैकदों के झूठे पैमानों से ख्वाब
उन्हीं में डूब के हम शाम बुझाएंगे
~ सह-भागिता (आनन्द खत्री,विकास त्रिपाठी, अंजलि ओझा, अनिता शर्मा, उत्कर्ष सिंह सोमवंशी, गुंजन अग्रवाल 'चारू' )
12/03/16
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