Sunday, 24 April 2016

सह-भागिता #29 - टीन के डब्बों में बंद ज़िंदगी

टीन के डब्बों में बंद ज़िंदगी
'बेस्ट बिफोर एक्सपायरी' है ज़िंदगी

ज़िंदा होने का एहसास देती
मिठास से लाज़वाब बनाती है ज़िंदगी

धीरे धीरे संकरी सुराखों से सांस लेती
देखने में अच्छी पर दुश्वार है ये ज़िंदगी

ठग रही है झूठ-सच के खेल में...
सँभालते अस्ल बेअंजाम है ज़िन्दगी

बिकता है यहाँ सब कुछ नाम के लिए
ज़िंदा-मज़ाक, और मौत पर तंज़ ज़िंदगी

टीन के डब्बों में बंद ज़िंदगी


मधुकर को फूलों की मेजबानी करती
ज़िंदगी से खफा ज़िन्दगी की दीवानी ज़िंदगी

जैसे पत्तों पर जमा बारिश का पानी
एक सफ़र की तरह आनी जानी ज़िंदगी
बोतल में बंद खस-इत्र सी नादान 
ओस की बूंदों सी दीवानी ज़िंदगी

महकती प्यार के पहले पत्र सी
मेहबूबा के इंतज़ार में बैठे वक़्त सी ज़िन्दगी

एक टहनी, चार पत्ता, रास्ता है मेरा
कभी पतझड़ कभी बहार है ज़िंदगी

दरारों से झांकती धूप, आँखों की चौंधियाहट
सुख दुःख का है बस एक रूप जिंदगी

सितारों की छाप, लकीरों का अभिशाप है ज़िंदगी
जिसकी बेवफ़ाई उसी की दुआ है ज़िंदगी

(सह-भागिता- आनंद खत्री, अंजलि ओझा, राजेश सिक्का, फर्रूख़ नदीम, अनिता शर्मा, विकास त्रिपाठी)
27/03/16



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