शिवना का गाँव
पहाड़ियों से घिरा हुआ नदी किनारे का वो सुरम्य गाँव ,जहाँ चहुँऔर हरियाली बिखरी पड़ी थी,सब उसे " शिवना का गाँव " कहते थे | लेकिन आखिर ये नाम पड़ा कैसे ?
नदियों के वेग को सँभालने धरती पे लकीर गहरी पड़ी थी। वनस्पति , खग, जीव सब अद्भुत रूप यौवन से सजे थे। आखिर शिवना में जग रही कैसी घड़ी थी ?
झर - झर बहता निर्झर,अपनी तीव्र गति के साथ नए उन्माद में जाने किस ओर बह रहा था। निर्झर से बहता संगीत कानों में जैसे मधुरस घोलता था और झरने से झरती बूंदें मोती की लड़ियों का आभास देती थीं ..... , इस शांत सुरम्य और सुंदर गाँव को लोग शिवना का गाँव कहते थे ! कैसे पड़ा ये नाम ?
नदियों के वेग को सँभालने धरती पे लकीर गहरी पड़ी थी। वनस्पति , खग, जीव सब अद्भुत रूप यौवन से सजे थे। आखिर शिवना में जग रही कैसी घड़ी थी ?
झर - झर बहता निर्झर,अपनी तीव्र गति के साथ नए उन्माद में जाने किस ओर बह रहा था। निर्झर से बहता संगीत कानों में जैसे मधुरस घोलता था और झरने से झरती बूंदें मोती की लड़ियों का आभास देती थीं ..... , इस शांत सुरम्य और सुंदर गाँव को लोग शिवना का गाँव कहते थे ! कैसे पड़ा ये नाम ?
इसकी भी एक कहानी है .... गाँव में इसी झरने के किनारे पहाड़ी पर एक शिव मंदिर है ...
अदम्य सुन्दर पहाड़ियों से घिरे इस शिव मन्दिर की कहानी शिवना नामक युवक से जुड़ी है .....जो अपनी युवावस्था में एक लड़की से प्यार करता था....शिवना -- जैसा नाम, वैसा ही सरल स्वभाव था उसका। 6 फुट का ऊँचा कद, बलिष्ठ शरीर,गेहूंआ रंग,घुंघराले काले बाल,सुरीली आवाज, मोहक मुस्कान का स्वामी शिवना अपने सहयोगी स्वभाव, मधुर वाणी, सरल ह्रदय के कारण सभी का दिल जीत लेता था।
शिवना बाँसुरी भी बहुत सुन्दर बजाता था.....उसकी बाँसुरी की लय् पर समस्त प्रकृति भी मानो थिरकने लगती थी.....शाम के धुंधलके में जब वो बंशी की तान छेड़ देता, तो नदी का कलरव करता हुआ जल भी शांत चित्त हो उसकी तान में तान मिलाने लगता ......सौम्य मनोहारिणी दृश्य आँखो को खूब लुभाता था ।नदी ही नहीं..पशु- पक्षी भी उसकी बाँसुरी की धुन में मंत्रमुग्ध होकर खो जाते थे ,गाँव का बच्चा- बच्चा जानता था कि शिवना की बाँसुरी में कोई ना कोई जादू है ,फिर भला शिवाँगी कैसे उसकी बाँसुरी के मोहपाश में नहीं बंधती ! शिवाँगी गाँव के ही मुखिया की बेटी थी ।रंग साँवला ,मझोला कद ,गठीला शरीर ,देखने में अत्यंत साधारण कन्या । लेकिन गुणों की तो जैसे खान थी वो। वो जो भी कार्य करती,इस सुघड़ता से करती,कि देखने वाले दांतों तले उंगली दबा लेते। ईश्वर ने उसे सौन्दर्य भले ही तंग हाथ से दिया हो,किंतु विभिन्न कलाओं में पारंगत कर भेजा था धरती पर।जब वो अपनी सुरीली तान छेड़ती,तो कोयल कुहुकना भूल उसे सुनने लगती,हवा थम जाती, चैतन्य जगत जड़ हो जाता।
शिवांगी शिवना से बेहद प्यार करती थी, दोनों रोज पहाड़ी के मन्दिर में मिलते, घंटो साथ समय बिताते|
अदम्य सुन्दर पहाड़ियों से घिरे इस शिव मन्दिर की कहानी शिवना नामक युवक से जुड़ी है .....जो अपनी युवावस्था में एक लड़की से प्यार करता था....शिवना -- जैसा नाम, वैसा ही सरल स्वभाव था उसका। 6 फुट का ऊँचा कद, बलिष्ठ शरीर,गेहूंआ रंग,घुंघराले काले बाल,सुरीली आवाज, मोहक मुस्कान का स्वामी शिवना अपने सहयोगी स्वभाव, मधुर वाणी, सरल ह्रदय के कारण सभी का दिल जीत लेता था।
शिवना बाँसुरी भी बहुत सुन्दर बजाता था.....उसकी बाँसुरी की लय् पर समस्त प्रकृति भी मानो थिरकने लगती थी.....शाम के धुंधलके में जब वो बंशी की तान छेड़ देता, तो नदी का कलरव करता हुआ जल भी शांत चित्त हो उसकी तान में तान मिलाने लगता ......सौम्य मनोहारिणी दृश्य आँखो को खूब लुभाता था ।नदी ही नहीं..पशु- पक्षी भी उसकी बाँसुरी की धुन में मंत्रमुग्ध होकर खो जाते थे ,गाँव का बच्चा- बच्चा जानता था कि शिवना की बाँसुरी में कोई ना कोई जादू है ,फिर भला शिवाँगी कैसे उसकी बाँसुरी के मोहपाश में नहीं बंधती ! शिवाँगी गाँव के ही मुखिया की बेटी थी ।रंग साँवला ,मझोला कद ,गठीला शरीर ,देखने में अत्यंत साधारण कन्या । लेकिन गुणों की तो जैसे खान थी वो। वो जो भी कार्य करती,इस सुघड़ता से करती,कि देखने वाले दांतों तले उंगली दबा लेते। ईश्वर ने उसे सौन्दर्य भले ही तंग हाथ से दिया हो,किंतु विभिन्न कलाओं में पारंगत कर भेजा था धरती पर।जब वो अपनी सुरीली तान छेड़ती,तो कोयल कुहुकना भूल उसे सुनने लगती,हवा थम जाती, चैतन्य जगत जड़ हो जाता।
शिवांगी शिवना से बेहद प्यार करती थी, दोनों रोज पहाड़ी के मन्दिर में मिलते, घंटो साथ समय बिताते|
ये बात शिवांगी के पिता को , जो की गाँव के मुखिया थे , को भी पता थी।
वो ये भी जानते थे की शिवना गरीब परिवार से ताल्लुक रखता है, और वे खुद ठहरे गाँव के मुखिया.....पर ये सच है की वो उसकी हैसियत पैसों से नही आंकते थे , बल्कि उसके गुणी और सरल स्वभाव पे मोहित थे और अपनी बेटी के लिए ऐसा ही योग्य लड़का चाहते थे।
वे जानते थे ,जिसमें गुण है,वो कभी भूखा नहीं रहेगा और न ही उनकी बेटी को भूखा रखेगा ।अपनी मेहनत से एक रोज शिवना भी उनकी तरह समाज में अपनी पहचान बनाएगा ।
पर किस्मत को तो कुछ और ही मंजूर था..
जैसा कि होता आया है, की हर कहानी में एक नायक होता है और एक नायिका होती है, वैसे ही एक खलनायक भी होता है ..कभी वो डकैत, लुटेरा ,कभी साहूकार, कभी बिमारी और कभी समाज की बुराइयों का रूप ले कर आता है ....
वो ये भी जानते थे की शिवना गरीब परिवार से ताल्लुक रखता है, और वे खुद ठहरे गाँव के मुखिया.....पर ये सच है की वो उसकी हैसियत पैसों से नही आंकते थे , बल्कि उसके गुणी और सरल स्वभाव पे मोहित थे और अपनी बेटी के लिए ऐसा ही योग्य लड़का चाहते थे।
वे जानते थे ,जिसमें गुण है,वो कभी भूखा नहीं रहेगा और न ही उनकी बेटी को भूखा रखेगा ।अपनी मेहनत से एक रोज शिवना भी उनकी तरह समाज में अपनी पहचान बनाएगा ।
पर किस्मत को तो कुछ और ही मंजूर था..
जैसा कि होता आया है, की हर कहानी में एक नायक होता है और एक नायिका होती है, वैसे ही एक खलनायक भी होता है ..कभी वो डकैत, लुटेरा ,कभी साहूकार, कभी बिमारी और कभी समाज की बुराइयों का रूप ले कर आता है ....
ऐसा ही हुआ शिवांगी और शिवना के साथ .... लेकिन कहानी कुछ अलग है ...उन दोनों का विवाह बड़ी धूमधाम से हुआ , पूरा गाँव सम्मिलित हुआ इस विवाह में ...उनके दिन पंख लगा कर उड़ने लगे ...लेकिन .. आर्थिक असमानता का ख़लनायक दोनों के बीच आने लगा ... शिवना जब भी किसी उत्सव में शिवांगी के परिवार में शामिल होता ,उसे हीनता का एहसास होता.... शिवांगी की सहज बातें भी उसे हीनता का एहसास करातीं.... और धीरे- धीरे यह रोग बढ़ता ही गया ...
शिवांगी के भाई का विवाह था.... उपहार में देने के लिए शिवना एक अंगूठी लाया अपनी हैसियत के हिसाब से...
! मुँहदिखाई के समय जब शिवांगी ने अंगूठी भाभी को दी .तो एक महिला ने परिहास करते हुए कहा....अंगूठी तो पत्ते जैसी है......ठीक उसी समय शिवना वहां से गुजरा और यह बात उसके दिल में तीर की तरह चुभ गई.......
! रात्रि भोज के समय शिवना का कहीं पता न था... सब ढूंढ़ कर थक गए.... शिवांगी बदहवास सी दौड़ती हुई घर आई . शिवना वहाँ भी न था....लेकिन तकिए पर उसकी की चिट्ठी थी.....
प्रिय शिवांगी..
मै तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ ...
लेकिन मैं तुम्हारे स्तर का नहीं ....
मैं जा रहा हूँ...जब तुम्हारे लायक बन जाऊँगा तो वापस जरूर आऊँगा ... मेरा इंतजार करना... तुम्हारा शिवना...!
इस बात को सात साल हो गए...
शिवानी पत्थर जैसी हो गई ...
ऊलझे बाल और वीरान आँखें....
वह बस एक शब्द बोलती ...शिवना.शिवना शिवना ...!! . शिवांगी हर शाम बेसुध सी उसी मंदिर में पहूँच जाती है..... शिवना का इंतजार करने...... और मंदिर के घंटे से एक ही स्वर सुनाई देता.....
शिवना.....शिवना.....शिवना.....
शिवांगी के भाई का विवाह था.... उपहार में देने के लिए शिवना एक अंगूठी लाया अपनी हैसियत के हिसाब से...
! मुँहदिखाई के समय जब शिवांगी ने अंगूठी भाभी को दी .तो एक महिला ने परिहास करते हुए कहा....अंगूठी तो पत्ते जैसी है......ठीक उसी समय शिवना वहां से गुजरा और यह बात उसके दिल में तीर की तरह चुभ गई.......
! रात्रि भोज के समय शिवना का कहीं पता न था... सब ढूंढ़ कर थक गए.... शिवांगी बदहवास सी दौड़ती हुई घर आई . शिवना वहाँ भी न था....लेकिन तकिए पर उसकी की चिट्ठी थी.....
प्रिय शिवांगी..
मै तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ ...
लेकिन मैं तुम्हारे स्तर का नहीं ....
मैं जा रहा हूँ...जब तुम्हारे लायक बन जाऊँगा तो वापस जरूर आऊँगा ... मेरा इंतजार करना... तुम्हारा शिवना...!
इस बात को सात साल हो गए...
शिवानी पत्थर जैसी हो गई ...
ऊलझे बाल और वीरान आँखें....
वह बस एक शब्द बोलती ...शिवना.शिवना शिवना ...!! . शिवांगी हर शाम बेसुध सी उसी मंदिर में पहूँच जाती है..... शिवना का इंतजार करने...... और मंदिर के घंटे से एक ही स्वर सुनाई देता.....
शिवना.....शिवना.....शिवना.....
शिवना कहीं नहीं था ।बहुत तलाश किया गया लेकिन सब व्यर्थ ,शिवना सामाजिक व आर्थिक विषमता से बहुत ज्यादा आहत हुआ था ,उसके क़दम गाँव से बाहर तो पड़े थे लेकिन किसी अच्छे उद्देश्य से ,किसी को इस बात की भनक तक ना थी कि मामूली सा शिवना अपने बाँसुरी बजाने के हुनर को किस सीमा तक आगे लेकर जायेगा ।
शिवना नें एक बड़े शहर में आकर अपना भाग्य आजमाया ,उसकी बाँसुरी के हुनर को एक बहुत बड़ी संगीत कम्पनी के मालिक नें पहचाना ,खुद शिवना नें भी कभी नहीं सोचा था कि उसका भाग्य और कर्म उसे ज़िंदगी के किस मार्ग पर लेकर जाने वाले हैं |
अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर शिवना के लिये प्रस्ताव आने लगे ,शिवना नें भी स्वयं को संगीत साधना में पूरी तरह रमा लिया था ,देखते ही देखते शिवना बहुत बड़ा बाँसुरी वादक बन गया ,सरस्वती व लक्ष्मी दोनों उसके पास थी ।समय बीतता गया और शिवना की झोली में पद्म विभूषण से लेकर भारत रत्न तक आते गये ,लेकिन शिवना अपने अतीत को नहीं भूल पाया..उसे रह- रह कर अपने गाँव और शिवाँगी की याद आती |अब उसके जीवन का एक ही उद्देश्य रह गया था...सामाजिक व आर्थिक विषमता की गहरी खाइयों को पाटना ।
शिवना नें कमर कस ली ,उसने गाँव -गाँव जाकर गरीब बच्चों को निःशुल्क बाँसुरी वादन प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया व अपने धन का प्रयोग बहुत सी संगीत अकादमी खोलने में किया जिसमें आर्थिक रूप से अक्षम लोगों को मुफ्त प्रशिक्षण दिया जाता था ।शिवना अब बहुत प्रसिद्ध हो चुका था उसके चर्चे उसके गाँव तक पहुँचे ,अब वही लोग जो कभी उसकी गरीबी का उपहास किया करते थे आज उसकी एक झलक देखने को उत्सुक हो रहे थे ,शिवाँगी जो शिवना की याद में बेसुध होकर जीवन व्यतीत कर रही थी ,शिवना की ख़बर पाकर जैसे पुनः जीवित हो उठी ।शिवना अपनी मुहिम को पूरा करने के क्रम में स्वयं अपने गाँव आया..पूरा गाँव उसे देखने को उमड़ पड़ा ,भीड़ को चीरती हुई शिवाँगी भी शिवना से मिलने आ पहुँची ,इतने वर्ष बाद एक दूसरे को देखकर आँखों से अश्रुधारा बह निकली ।बहुत ही भावविभोर करने वाला दृश्य था ।गाँव वालों को अपनी संकीर्ण सोच पर बहुत ज्यादा पश्चाताप हो रहा था ,सभी ने मिलकर शिवना से गाँव में ही रहने का अनुरोध किया जिसे शिवना नें सहर्ष स्वीकार किया..इसी खुशी में गाँव के सरपंच नें गाँव का नया नामकरण शिवना के नाम पर करने की घोषणा की ।
और इस तरह वो गाँव "शिवना का गाँव " कहलाया जाने लगा |
(~सहभागिता -- सरोज सिंह परिहार ,अनिता शर्मा ,उत्कर्ष सिंह सोमवंशी ,अल्पना नागर ,आनंद खत्री ,चारू अग्रवाल ,माधुरी स्वर्णकार )
शिवना नें एक बड़े शहर में आकर अपना भाग्य आजमाया ,उसकी बाँसुरी के हुनर को एक बहुत बड़ी संगीत कम्पनी के मालिक नें पहचाना ,खुद शिवना नें भी कभी नहीं सोचा था कि उसका भाग्य और कर्म उसे ज़िंदगी के किस मार्ग पर लेकर जाने वाले हैं |
अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर शिवना के लिये प्रस्ताव आने लगे ,शिवना नें भी स्वयं को संगीत साधना में पूरी तरह रमा लिया था ,देखते ही देखते शिवना बहुत बड़ा बाँसुरी वादक बन गया ,सरस्वती व लक्ष्मी दोनों उसके पास थी ।समय बीतता गया और शिवना की झोली में पद्म विभूषण से लेकर भारत रत्न तक आते गये ,लेकिन शिवना अपने अतीत को नहीं भूल पाया..उसे रह- रह कर अपने गाँव और शिवाँगी की याद आती |अब उसके जीवन का एक ही उद्देश्य रह गया था...सामाजिक व आर्थिक विषमता की गहरी खाइयों को पाटना ।
शिवना नें कमर कस ली ,उसने गाँव -गाँव जाकर गरीब बच्चों को निःशुल्क बाँसुरी वादन प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया व अपने धन का प्रयोग बहुत सी संगीत अकादमी खोलने में किया जिसमें आर्थिक रूप से अक्षम लोगों को मुफ्त प्रशिक्षण दिया जाता था ।शिवना अब बहुत प्रसिद्ध हो चुका था उसके चर्चे उसके गाँव तक पहुँचे ,अब वही लोग जो कभी उसकी गरीबी का उपहास किया करते थे आज उसकी एक झलक देखने को उत्सुक हो रहे थे ,शिवाँगी जो शिवना की याद में बेसुध होकर जीवन व्यतीत कर रही थी ,शिवना की ख़बर पाकर जैसे पुनः जीवित हो उठी ।शिवना अपनी मुहिम को पूरा करने के क्रम में स्वयं अपने गाँव आया..पूरा गाँव उसे देखने को उमड़ पड़ा ,भीड़ को चीरती हुई शिवाँगी भी शिवना से मिलने आ पहुँची ,इतने वर्ष बाद एक दूसरे को देखकर आँखों से अश्रुधारा बह निकली ।बहुत ही भावविभोर करने वाला दृश्य था ।गाँव वालों को अपनी संकीर्ण सोच पर बहुत ज्यादा पश्चाताप हो रहा था ,सभी ने मिलकर शिवना से गाँव में ही रहने का अनुरोध किया जिसे शिवना नें सहर्ष स्वीकार किया..इसी खुशी में गाँव के सरपंच नें गाँव का नया नामकरण शिवना के नाम पर करने की घोषणा की ।
और इस तरह वो गाँव "शिवना का गाँव " कहलाया जाने लगा |
(~सहभागिता -- सरोज सिंह परिहार ,अनिता शर्मा ,उत्कर्ष सिंह सोमवंशी ,अल्पना नागर ,आनंद खत्री ,चारू अग्रवाल ,माधुरी स्वर्णकार )