Monday, 10 October 2016

#180- शिवना का गाँव


                                            शिवना का गाँव 
पहाड़ियों से घिरा हुआ नदी किनारे का वो सुरम्य गाँव ,जहाँ चहुँऔर हरियाली बिखरी पड़ी थी,सब उसे " शिवना का गाँव " कहते थे | लेकिन आखिर ये नाम पड़ा कैसे ?
नदियों के वेग को सँभालने धरती पे लकीर गहरी पड़ी थी। वनस्पति , खग, जीव सब अद्भुत रूप यौवन से सजे थे। आखिर शिवना में जग रही कैसी घड़ी थी ?
झर - झर बहता निर्झर,अपनी तीव्र गति के साथ नए उन्माद में जाने किस ओर बह रहा था। निर्झर से बहता संगीत कानों में जैसे मधुरस घोलता था और झरने से झरती बूंदें मोती की लड़ियों का आभास देती थीं ..... , इस शांत सुरम्य और सुंदर गाँव को लोग शिवना का गाँव कहते थे ! कैसे पड़ा ये नाम ?
 इसकी भी एक कहानी है .... गाँव में इसी झरने के किनारे पहाड़ी पर एक शिव मंदिर है ...
अदम्य सुन्दर पहाड़ियों से घिरे इस शिव मन्दिर की कहानी शिवना नामक युवक से जुड़ी है .....जो अपनी युवावस्था में एक लड़की से प्यार करता था....शिवना -- जैसा नाम, वैसा ही सरल स्वभाव था उसका। 6 फुट का ऊँचा कद, बलिष्ठ शरीर,गेहूंआ रंग,घुंघराले काले बाल,सुरीली आवाज, मोहक मुस्कान का स्वामी शिवना अपने सहयोगी स्वभाव, मधुर वाणी, सरल ह्रदय के कारण सभी का दिल जीत लेता था।
शिवना बाँसुरी भी बहुत सुन्दर बजाता था.....उसकी बाँसुरी की लय् पर समस्त प्रकृति भी मानो थिरकने लगती थी.....शाम के धुंधलके में जब वो बंशी की तान छेड़ देता, तो नदी का कलरव करता हुआ जल भी शांत चित्त हो उसकी तान में तान मिलाने लगता ......सौम्य मनोहारिणी दृश्य आँखो को खूब लुभाता था ।नदी ही नहीं..पशु- पक्षी भी उसकी बाँसुरी की धुन में मंत्रमुग्ध होकर खो जाते थे ,गाँव का बच्चा- बच्चा जानता था कि शिवना की बाँसुरी में कोई ना कोई जादू है ,फिर भला शिवाँगी कैसे उसकी बाँसुरी के मोहपाश में नहीं बंधती ! शिवाँगी गाँव के ही मुखिया की बेटी थी ।रंग साँवला ,मझोला कद ,गठीला शरीर ,देखने में अत्यंत साधारण कन्या । लेकिन गुणों की तो जैसे खान थी वो। वो जो भी कार्य करती,इस सुघड़ता से करती,कि देखने वाले दांतों तले उंगली दबा लेते। ईश्वर ने उसे सौन्दर्य भले ही तंग हाथ से दिया हो,किंतु विभिन्न कलाओं में पारंगत कर भेजा था धरती पर।जब वो अपनी सुरीली तान छेड़ती,तो कोयल कुहुकना भूल उसे सुनने लगती,हवा थम जाती, चैतन्य जगत जड़ हो जाता।
शिवांगी शिवना से बेहद प्यार करती थी,  दोनों रोज पहाड़ी के मन्दिर में मिलते, घंटो साथ समय बिताते|
 ये बात शिवांगी के पिता को , जो की गाँव के मुखिया थे , को भी पता थी।
वो ये भी जानते थे की शिवना गरीब परिवार से ताल्लुक रखता है, और वे खुद ठहरे गाँव के मुखिया.....पर ये सच है की वो उसकी हैसियत पैसों से नही आंकते थे , बल्कि उसके गुणी और सरल स्वभाव पे मोहित थे और अपनी बेटी के लिए ऐसा ही योग्य लड़का चाहते थे।
वे जानते थे ,जिसमें गुण है,वो कभी भूखा नहीं रहेगा और न ही उनकी बेटी को भूखा रखेगा ।अपनी मेहनत से एक रोज शिवना भी उनकी तरह समाज में अपनी पहचान बनाएगा ।
पर किस्मत को तो कुछ और ही मंजूर था..
जैसा कि होता आया है, की हर कहानी में एक नायक होता है और एक नायिका होती है, वैसे ही एक खलनायक भी होता है ..कभी वो डकैत, लुटेरा ,कभी साहूकार, कभी बिमारी और कभी समाज की बुराइयों का रूप ले कर आता है ....
ऐसा ही हुआ शिवांगी और शिवना के साथ .... लेकिन कहानी कुछ अलग है ...उन दोनों  का विवाह बड़ी धूमधाम से हुआ , पूरा गाँव सम्मिलित हुआ इस विवाह में ...उनके दिन पंख लगा कर उड़ने लगे ...लेकिन .. आर्थिक असमानता का ख़लनायक दोनों  के बीच आने लगा ... शिवना जब भी किसी उत्सव में शिवांगी के परिवार में शामिल होता ,उसे हीनता का एहसास होता.... शिवांगी की सहज बातें भी उसे हीनता का एहसास करातीं.... और धीरे- धीरे यह रोग बढ़ता ही गया ...
शिवांगी के भाई का विवाह था.... उपहार में देने के लिए शिवना एक अंगूठी लाया अपनी हैसियत के हिसाब से...
! मुँहदिखाई के समय जब शिवांगी ने अंगूठी भाभी को दी .तो एक महिला ने परिहास करते हुए कहा....अंगूठी तो पत्ते जैसी है......ठीक उसी समय शिवना वहां से गुजरा और यह बात उसके दिल में तीर की तरह चुभ गई.......
! रात्रि भोज के समय शिवना का कहीं पता न था... सब ढूंढ़ कर थक गए.... शिवांगी बदहवास सी दौड़ती हुई घर आई . शिवना वहाँ भी न था....लेकिन तकिए पर उसकी की चिट्ठी थी.....
प्रिय शिवांगी..
मै तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ ...
लेकिन मैं तुम्हारे स्तर का नहीं ....
मैं जा रहा हूँ...जब तुम्हारे लायक बन जाऊँगा तो वापस जरूर आऊँगा ... मेरा इंतजार करना... तुम्हारा शिवना...!
इस बात को सात साल हो गए...
शिवानी पत्थर जैसी हो गई ...
ऊलझे बाल और वीरान आँखें....
वह बस एक शब्द बोलती  ...शिवना.शिवना शिवना ...!! . शिवांगी हर शाम बेसुध सी उसी मंदिर में पहूँच जाती है..... शिवना का इंतजार करने...... और मंदिर के घंटे से एक ही स्वर सुनाई देता.....
शिवना.....शिवना.....शिवना.....
शिवना कहीं नहीं था ।बहुत तलाश किया गया लेकिन सब व्यर्थ ,शिवना सामाजिक व आर्थिक विषमता से बहुत ज्यादा आहत हुआ था ,उसके क़दम गाँव से बाहर तो पड़े थे लेकिन किसी अच्छे उद्देश्य से ,किसी को इस बात की भनक तक ना थी कि मामूली सा शिवना अपने बाँसुरी बजाने के हुनर को किस सीमा तक आगे लेकर जायेगा ।
शिवना नें एक बड़े शहर में आकर अपना भाग्य आजमाया ,उसकी बाँसुरी के हुनर को एक बहुत बड़ी संगीत कम्पनी के मालिक नें पहचाना ,खुद शिवना नें भी कभी नहीं सोचा था कि उसका भाग्य और कर्म उसे ज़िंदगी के किस मार्ग पर लेकर जाने वाले हैं |
अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर शिवना के लिये प्रस्ताव आने लगे ,शिवना नें भी स्वयं को संगीत साधना में पूरी तरह रमा लिया था ,देखते ही देखते शिवना बहुत बड़ा बाँसुरी वादक बन गया ,सरस्वती व लक्ष्मी दोनों उसके पास थी ।समय बीतता गया और शिवना की झोली में पद्म विभूषण से लेकर भारत रत्न तक आते गये ,लेकिन शिवना अपने अतीत को नहीं भूल पाया..उसे रह- रह कर अपने गाँव और शिवाँगी की याद आती |अब उसके जीवन का एक ही उद्देश्य रह गया था...सामाजिक व आर्थिक विषमता की गहरी खाइयों को पाटना ।
शिवना नें कमर कस ली ,उसने गाँव -गाँव जाकर गरीब बच्चों को निःशुल्क बाँसुरी वादन प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया व अपने धन का प्रयोग बहुत सी संगीत अकादमी खोलने में किया जिसमें आर्थिक रूप से अक्षम लोगों को मुफ्त प्रशिक्षण दिया जाता था ।शिवना अब बहुत प्रसिद्ध हो चुका था उसके चर्चे उसके गाँव तक पहुँचे ,अब वही लोग जो कभी उसकी गरीबी का उपहास किया करते थे आज उसकी एक झलक देखने को उत्सुक हो रहे थे ,शिवाँगी जो शिवना की याद में बेसुध होकर जीवन व्यतीत कर रही थी ,शिवना की ख़बर पाकर जैसे पुनः जीवित हो उठी ।शिवना अपनी मुहिम को पूरा करने के क्रम में स्वयं अपने गाँव आया..पूरा गाँव उसे देखने को उमड़ पड़ा ,भीड़ को चीरती हुई शिवाँगी भी शिवना से मिलने आ पहुँची ,इतने वर्ष बाद एक दूसरे को देखकर आँखों से अश्रुधारा बह निकली ।बहुत ही भावविभोर करने वाला दृश्य था ।गाँव वालों को अपनी संकीर्ण सोच पर बहुत ज्यादा पश्चाताप हो रहा था ,सभी ने मिलकर शिवना से गाँव में ही रहने का अनुरोध किया जिसे शिवना नें सहर्ष स्वीकार किया..इसी खुशी में गाँव के सरपंच नें गाँव का नया नामकरण शिवना के नाम पर करने की घोषणा की । 

और इस तरह  वो गाँव "शिवना का गाँव " कहलाया जाने लगा |

(~सहभागिता -- सरोज सिंह परिहार ,अनिता शर्मा ,उत्कर्ष सिंह  सोमवंशी ,अल्पना नागर ,आनंद खत्री ,चारू अग्रवाल ,माधुरी स्वर्णकार )

Saturday, 1 October 2016

# 178 - नव-रात्रों के आगमन पर

नव ओज,नव सोच और ऊर्जा नयी है
माँ के आगमन से उल्लासित भोर हुई है
मिटे कष्ट सब फैला हर सू उजाला
नवल दिव्य छवि माँ का दर्शन निराला!
नव भाव नयी सोच का आरंभ तुम्ही हो
दिव्य हैं माँ के दर्शन जगमग है देवाला
देव-शक्ति, मनुष्य-मूल का सूत्र तुम्ही हो
तुम्हीं आदि शक्ति तुम्ही कल्याणी हो
वन्दना-प्रसंग, प्रजा का वन्द-प्रसार तुम्ही हो
अन्न दायिनी श्वेत वस्त्र धारिणी मातु भवानी तुम्ही हो
विचार का साकार, दृष्टि को आकार तुम्ही हो
शक्ति प्रदायिनी ,सर्व सुख दायिनी
मंगल कारिणी, रिपु दल हारिणी तुम्ही हो
सूत्र जगी शक्तियां, उत्पीड़ितों का दर्द भी
अपराध-दोष को क्षम्य-याचना भी तुम्ही हो।



~ अनिता शर्मा , सरोज सिंह परिहार, सुधीर पान्डे, अल्पना नागर, माधुरी स्वर्णकर, चारु अग्रवाल, आनन्द खत्री 

Friday, 12 August 2016

# 154 क्या यह पतझड़ की साँझ सखे

सह भागिता - हरिवंश राय बच्चन


"नीलाम के पल्लव टूट गये
मरकत के साथी छूट गए
अटके फिर भी दो पीत पात, जीवन डाली को थाम सखे
है यह पतझड़ की साँझ सखे" ~ हरिवंश राय बच्चन

कल फिल नव कोंपल फूटेंगी
कलिंयाँ फिर नवरस लूटेंगीं
यह शास्वत सत्य सृजन का है,मत समझो इसे विराम सखे
क्या यह पतझड़ की साँझ सखे

सूखे दिल पोखर कूल सभी
प्यासे पर अश्रु की धार सधी
निज चिंतन को यादें दो घट, जीवन कविता श्रृंगार सखे
क्या यह पतझड़ की साँझ सखे

मुझसे मेरा घट छूट रहा
व्याकुल मन भी यह रूठ रहा
क्यूं विरह अगन में जलते हैं,मेरे नयना दिन रात सखे
क्या यह पतझड़ की साँझ सखे।।

नव बसंत कल फिर आयेगा
मन में उल्लास जगायेगा
मत रोको इन अहसासों को,हैं यह सांस और प्राण सखे
क्या यह पतझड़ की साँझ सखे।।

जब साँझ का कलरव फूटेगा
मधुघट पर बेला महकेगा
जब चषक सधे लब पर लब हों , फिर क्यों ऐसा वैराग सखे
क्या यह पतझड़ की साँझ सखे

होते अधीर मुख कांति नहीं
जीवित है पर विश्रांति नहीं
सद्चिंतन अंगीकार करो,सुख-दुःख हैं बस परिधान सखे
क्या यह पतझड़ की सांझ सखे

जब ढली दोपहर जीवन की
मन मरुथल की तरूणाई के
इक अनजाने बंधन में तू , अब मत इस मन को बांध सखे,
क्या यह पतझड़ की सांझ सखे ।

सुरभित कर मन कलिकाओं को
आनंद की इन क्षणिकाओं को
कोमल भावों के धागे से, इक प्रेम डोर में बाँध सखे
क्या यह पतझड़ की साँझ सखे।

बढ़ा क़दम रुके नहीं
निशा में भी थके नहीं
कर असंख्य तू सृजन, यह वक़्त की पुकार सखे
क्या यह पतझड़ की साँझ सखे!!!

देह विटप से विलग पात
कोंपल बन आते पुनः साथ
फिर क्यूं कहते हो अंत प्रिये , यह सृष्टि का है चक्र सखे
क्या यह पतझड़ की साँझ सखे ?

क्या हुआ कल्पना गुमसुम है
क्या हुआ कोर दृग भी नम है
नजरे पथराई जैसी और हुई भावना बाँझ सखे
क्या यह पतझड़ की सांझ सखे

इस बेला में पाई उलझन!
अपने मन से होती अनबन!!
जीवन को धवल बना खुदको, अब अच्छे से दे माँज सखे
क्या यह पतझड की साँझ सखे

सायों की बढती लंबाई
और गहरी होती तन्हाई
इस रंगपटल पे चलते हैं, सतत बहुत से स्वांग सखे !!
क्या यह पतझड़ की सांझ सखे

~ गुंजन चारु अग्रवाल, शैलेन्द्र चौहान, अल्पना , सुधीर पाण्डे, सरोज सिंह परिहार , आनन्द खत्री (सूफ़ी बेनाम)



Thursday, 4 August 2016

# 59 "बोगनविलिया तेरी रंगीन दोपहरी "



हे ! बोगनविलिया तेरी रंगीन दोपहरी
थक कर हवा तेरे घने से साए में ठहरी ..

इतनी धूप है फिर भी तेरी रंगत गहरी !!
बोलगी अब बहुत जोर से याद -टिटहरी..

खिला फूल- सा देखो यहाँ हर शाख -पत्ता भी
सूखी धुप में भी रंग-ओ-ख़ुशी है बिखेरी..

घर के दरवाज़े पे पुरखों  की अब भी प्रहरी
अलमस्त नवोढ़ा, बिखरे यौवन देहरी..

अब भी लगती है काग़ज़ के फूलों  जैसी
गाँव लौटकर तेरी वो बातें शहरी..

साए में तेरे बैठना भी पुरसुकून है
सुनकर बुजुर्गो की नसीहते गहरी..

कांटे, ठूंठ पात -दर -पात श्रृंगार वल्लरी
रंगीन लहरिया पहन नाचता भर दुपहरी..

बोगनविलिया जरा सा सुन तो ले री
कितने अरमान जगाती निःस्तब्ध दोपहरी..

तृप्त क्षुधा बाद आती  दिन नींद सी प्यारी
हवा का झोंका, थकावट और ये खुमारी..

हे ! बोगनविलिया तेरी रंगीन दोपहरी...!!!




(~ सहभागिता~ सरोज सिंह परिहार ,सुधीर पांडे ,आनंद खत्री,उत्कर्ष सिंह सोमवंशी,फर्रुख नदीम,राजेश सिक्का,अनिता शर्मा )






17/04/16

Wednesday, 3 August 2016

#35 तरकश में रच ख्याल बसी थी



तरकश में रच ख्याल बसी थी
तुमको पाने की हर ख़्वाहिश

छल धार तीर ले तरुणी थी
क्या है बाकी कोई गुंजाइश

तनी कमानी भवें चलानी थी
रख रहीं हैं एक फरमाइश

रिश्ता रिश्ता भटक रही थी
डोर बंधी उम्मीदों की गर्दिश

इस तलाश का अंत नहीं अब
कहो क्या आखरी आजमाइश

तीर लगे फिर जाँ क्यों नहीं जाती
किसकी दुआओं  की है गुज़ारिश..

(~सहभागिता - आनंद खत्री, चारू अग्रवाल,अंजली ओझा,राजेश सिक्का,फर्रुख नदीम,विकास त्रिपाठी )




01/04/16

# 31 - खुले आसमां में परिंदे को देखो



खुले आसमां में परिंदे को देखो
कितनी बुलंद परवाज़ है इसकी
फ़रिश्ते ,इंसान और शैतान के नुमाएंदे देखो
आसमान पे हक बनाये हुए है
इंसा में जीने का जज़्बा जगाये हुए है
कुछ बोझ- सा भी परों पर उठाए हुए हैं

निकला है बच्चों की भूख मिटाने
या भटकते बादलों को रास्ता दिखाने
ऊँचा, ऊँचा और ऊँचा उड़ा जा रहा है
पंखों से सूरज ढके जा रहा है
अपनी क़ाबलियत से रूबरू करा रहा है
सात घोड़ों से दौड़ है उसकी

जैसे मज़हब से परे इन्सान को देखो
कैसे आपस में भाईचारा निभा रहा है..!

(~ सहभागिता - आनंद खत्री ,अंजली ओझा, राजेश सिक्का ,अनिता शर्मा , उत्कर्ष सिंह सोमवंशी, फर्रुख नदीम ,चारू अग्रवाल)



#30-बूँद का सफर

# 30 बूँद का सफर - ये सफर लिखते समय ये कोशिश करनी है कि बूँद से पानी, पानी के अलग -अलग रूप , पानी के मुहावरे (जैसे "खून पानी है "), उपमा ,इत्यादि का स्तेमाल करते हुए लिखें।


शबनम की बूँदें सूखे पत्तों पर
बहती रहीं सुर्ख आँखों के रास्ते भी
दिल में दबी आतिश से भाप बनकर
उड़ती रही सहराओं में कहीं कभी
धुंधला आंखों की कफ़स को करती रही
चश्म-ए-नम आंखों की खासलत रखती भी
छिपाये दिल में कितने सवाल रखती है
वहीं जो खून-आब को गुलाल रखती भी
निखरती रही धूप की तपिश सह- सह कर
फूलों में जश्ने शबाब रखती भी
वो सीने में अख़्गर, आंखों में तुषार रखती है
बर्फ का सेक रखती हैं तुम्हारी गुज़री यादें भी
वो शंग आबेरवाँ -सा मिजाज रखती है
बंजर मिटटी हर बूँद सोखने का अंदाज़ रखती भी
शबनम को जलने दो के भाप तबियत में परवाज़ रखती है
चरम तक उड़, भाप बादली आभास रखती भी
बन फिर मेघदूत भ्रमण को निकलती है
और अंत में जा सकती हैं खुद में धरती भी ....
समुन्दर से पूछती की तुझ में मैं, कि मुझ में तू है
किसी आँचल में मेरे माथे की महक बसती भी
इस ममता के लिए कई ज़िंदगियाँ तरसती है
क्यों अब्रे आसमान से ज़मीन पे उतरती भी
शबनम की बूंदे सूखे पत्ते पे आ के रूकती है
रख सबर,अधजल गगरी सा क्यूँ छलकता है
सागर की लहरो सी क्यों वो मचली भी
उजले कोहसरों से फिसलती, पिघलती है
भृष्टि की हर बूँद क्यों प्यासी भी................

(~सहभागिता - आनंद खत्री , चारू अग्रवाल'गुंजन', अनिता शर्मा,फर्रुख नदीम,राजेश सिक्का,विकास त्रिपाठी,अंजली ओझा )










29/03/16










सहभागिता # 34 ज़िंदगी सिर्फ ख्वाइशों का पुलिंदा हैं



ज़िंदगी सिर्फ ख्वाइशों का पुलिंदा है
कुछ सिर्फ खलिश हैं, कुछ ज़िंदा है..

बिखरा धूप -सा यादों की छाँव में
कुछ दवा, कुछ ख्वाइश-कदा रिंदा है..

ख्वाब बुनता हूँ, डूब कर इश्क़ में
उड़ता रहता हूँ, जैसे कोई परिंदा है..

सो जाता हूँ, सूखे दरख्तों की छाँव में
लिए हसब-नसब की गठरी चुनिंदा है..

नित- नए ताने- बाने बुनता रहता है
ज़िंदगी ख्वाइशों का लिये पुलिंदा है...!!!

(~सहभागिता - आनंद खत्री ,अंजली ओझा ,प्रीती शर्मा ,चारू अग्रवाल,अनिता शर्मा, राजेश सिक्का ,विकास त्रिपाठी )

31/03/16


Tuesday, 26 July 2016

142. रिश्तों की धूप-छाँव

रिश्तों की धूप में थोड़ी सी छाँव बाकी रहे
चुभती चुप्पियों में थोड़ा सम्वाद बाकी रहे..

दरख्तों के इर्द - गिर्द परिंदों की अठखेलियां
रिसती उँगलियों की पोर में थोड़ा रियाज़ बाकी रहे..

बढ़ती उम्र की संजीदगी में बचपन की नादानियां
आँखों में न सही,जेबों में सही ,थोड़े ख्वाब बाकी रहे..

मनमुटावों की सरहद से चलो अब लौट आएं
खुद को ढूंढने की सलाहियत साथ में बाकी रहे..

चलो दो पल कहीं पर बैठ कर दो लफ्ज बुन डालें
सिमटते सूखते से ताल में थोड़ी नमी बाकी रहे..

उलझती जा रही इन गुत्थिय़ों में बसी नर्मियां
शहरियों के मन में थोड़ा सा गाँव बाकी रहे..

पीड़ित बुजुर्गों का रख-रखाव और प्यार
चरित्र की गिरावट मेंं भी आत्मा का उठाव बाकी रहे..

आज की पीढ़ी में विनम्रता और झुकाव
राष्ट्रोन्मुख चिन्तन का मनोभाव बाकी रहे..

मर्यादा और मान से सींचित घर खलिहान रहे ...
कभी फसल का कभी हल से खुदा परिधान बाकी रहे

संबंधों में दिल का संबोधन साया दे, धूप दे
रिश्तों की धूप में थोड़ी सी छाँव बाकी रहे....

(सहभागिता ~चित्रा देसाई ,भूपेन्द्रसिंह,आनंद खत्री ,गुंजन अग्रवाल ,अल्पना नागर,फ़र्रुख नदीम,सरोजसिंह परिहार,उत्कर्ष सिंह सोमवंशी )


Wednesday, 15 June 2016

#. 120. चाह नहीं

प्रख्यात कवि श्री माखनलाल चतुर्वेदी जी को श्रद्धांजलि स्वरुप उनकी  सुप्रसिद्ध रचना     " चाह नहीं सुरबाला के गहनों में गुंथा जाऊ " से प्रेरित ....


चाह नहीं शरमाई कली से 
खिल कर महक बन जाऊं,
 चाह नहीं रंगों से ओत प्रोत
 इंद्रधनुष मैं बन जाऊं, 
चाह नहीं बन कर मोती 
रत्नों संग जड़ा जाऊँ,
 चाह नहीं होकर ध्वनित
 कलरव सा गूंज जाऊँ, 
चाह नहीं बन सीप 
समंदर गहरे तल समा जाऊं, 
चाह नहीं बन इत्र गुलाल 
पग पग मैं सबके मेहकाऊँ, 
चाह नहीं रंग रोगन से
 मैं चक्षु को फुसलाऊं, 
चाह नहीं बन प्रेम पत्र मैं
 युवा मन को बहलाऊं, 
चाह नहीं ऊँचे भवनों की 
शान पताका बन लहराऊं, 
चाह नहीं आकर्षित करने
 केश सज्जा के काम आऊँ, 
चाह नहीं गुलदान में महकूँ
 आगंतुक मन हर्षाऊं, 
चाह नहीँ सतरंगी सपने
 इन आँखो में रोज़ सजाऊं,
 चाह नहीं यूँ शाँत बैठकर
 गीत सुहाने मैं गाऊँ,

 चाह है मेरी तो सर्वदा 
मुझको रंग तिरंगा कर दे
 तो झूमूँ नभ में लहराऊँ, 
बन कर कीर्ति पताका 
भारत नाम जग में फहराऊँ, 
गूंथा जाऊं उस माला में
 सैनिक को जो पहनानी हो, 
भारत माँ की रक्षा की ही 
जिसने मन में ठानी हो...!!!

(~सहभागिता ~ सुधीर पांडे, आनंद खत्री , अनिता शर्मा ,अल्पना नागर ,गुंजन अग्रवाल,राजेश सिक्का ,  फ़र्रुख नदीम ,प्रांजल पांडे )

14/06/16




Sunday, 5 June 2016

# 32 तेरी यादों के साए में जिए जा रहा हूँ

# 32
तेरी यादों के साए में जिए जा रहा हूँ
खुद अश्क़ अपने पीये जा रहा हूँ
खलिश से अपनी ज़िल्ल् बचाकर
उस रश्केमेहर की खातिर पारसाई हुए जा रहा हूँ....

जानता हूँ वो मेरी नहीं
अब उसकी परछायी लिए जा रहा हूँ
हकीकत से उसको सिये जा रहा हूँ

यादो का कारवां है साथ मेरे
तपती रेत पर यूं चले जा रहा हूँ

शुक्र करूँ, सब्र करूँ, के फिक्र करूँ?
जुदा हो के भी उसको साथ लिए जा रहा हूँ
उलझा उसके काकुले पेचाँ में इस कदर
अंधेरों को चराग किए जा रहा हूँ
उस जिस्म की खुश्बू से रूह को महका रहा हूँ
खिज़ाओं को गुलशन किए जा रहा हूँ

अब हर तरफ तू ही तू है
मैं आईने से शिकवा किए जा रहा हूँ
खुदी को खुद से बहला रहा हूं
तुम्हारी ज़रुरत कम किये जा रहा हूँ

माना अब हम नदी के दो किनारे है
पानी का हाथ पकड़ साथ लिए जा रहा हूँ
कर लिए कई मरहले पार फिर भी,
एक आस लिए जीए जा रहा हूँ।

दास्ताने मोहब्बत लिखी भी तो लहरों पर
कश्ती हिचकोले खाती लगेगी किनारे पर
जिन हर्फ़ओ पे कल एक नज़्म थी उनको उड़ा रहा हूँ

जिन्दगी हर एक साँस पे जीये जा रहा हूँ ..
नाम सिर्फ तेरा लिए जा रहा हूं...
तेरी यादों के सायों को बहला रहा हूँ...

( रश्केमेहर - More dazzling than the Sun,सूर्य से भी सुन्दर प्रेयसी,पारसाई - self restraint,
काकुले पेचाँ - घुंघराले बाल)

(~सहभागिता - उत्कर्ष सिंह सोमवंशी,राजेश सिक्का,अंजली ओझा ,आनंद खत्री,विकास त्रिपाठी,मो.शब्बीर,फर्रुख नदीम,गुंजन अग्रवाल,अनिता शर्मा )


30/03/16



# 104 - सह भागिता : चित्रा देसाई(104 A to 104 G )


सह भागिता में लिखी गयी ये पक्तियां चित्रा देसाई जी को हम सब की तरफ से एक भेंट है। हम सबने उनकी कविता पढ़ कर सीखा और लिखा। (
19/05/2016)


104 A--


अजीब से ख्वाब देखता हूँ मैं
कितने नादान दिख रहे है अभी
वफा के सूख चुके दरिये में,
प्यार की मछलियों की चाहत में ,
जाल एहसास का डाले बैठे,
कितने तस्कीनजदा लगते हैं !!
अजीब ख्वाब देखता हूँ मैं !!

समंदर दौड रहा नदी की तरफ ,

कैसा मंजर ,अजीब बात है न !
सूरज आमादा रात से मिलने
रात चुप क्यों अजीब रात है न !!
अजीब से ख्वाब देखता हूँ मैं!!


चलती ट्रेन के रुकने पे जब उतरता हूँ

एक भी शख्स प्लेटफार्म पर नहीं दिखता !
और तो और फिर निकलने को बाहर,
एक भी दरवाजा रास्ता नहीं दिखता !!
अजीब से ख्वाब देखता हूँ मैं !!

तपते सहरे में बेसिम्त भाग रहा है कौन

और ये किसके पीछे भाग रहा हूँ मैं भी
किसकी तलाश जहन में  यूँ तारी है कि
नींद मे होते हुये ऐसे जाग रहा हूँ मैं भी
अजीब से ख्वाब देखता हूँ मैं!!

किसी पहाड़ पर बारिश के पहले मौसम मे

किसी के साथ- साथ रोज भीग जाता हूँ,
कौन है वो, जो हकीकत में कहीं दिखता नहीं,
आँख खुलने पे तो वो चेहरा भी भूल जाता हूँ
आजकल अजीब से ख्वाब देखता हूँ मैं !!

ख्वाब में बारहा दिखती है मुझे एक नदी

और नदी के पार से आवाज एक आती है
जानी पहचानी सी दर्दीली शीरानी आवाज
अजीब बात तभी नींद टूट जाती है
इन दिनो अजीब से ख्वाब देखता हूँ मैं !!

(सुधीर पांडे "व्यथित ")


104B--


चार पल से

लदी हुई एक बैल गाड़ी
चाक के पहियों के
घिसे गुटिकाधार रंगीन

अपने ही अक्स में

मिली आँखों की सीढ़ियां
यादों के जाफरान मोहल्ले
गांव खलिहान मकान

तनहा-उधाडा भीड़ में

फ़ितरत-मशगूल अकेला
घूमता रहता हूँ
तुम भी कहीं हो शायद

इंतज़ार रहता है

जालों में फँसी ओस
धीरे-धीरे भाप बनकर
खिसकने का

पलटने पर भी

दीखता नहीं कोई
बस सरसराती पत्तियां
और गहरे दरख़्त

आजकल कुछ  ख़्वाब अजीब  देखता हूँ मैं...

(आनंद खत्री "सूफी बेनाम")


104C--


ख्यालों के पंछी
दिल के आसमान में
रोज़ नयी उड़ान भरते हैं
जहाँ की सभी दीवारों पे
रात दिन लगातार खुरचती रहती हैं
तेरा नाम कुछ यादें

नोंच कर फलक से सारे सितारों को

अपनी चुनर में सहेज रही हूँ मैं
और कभी तक कर रास्ता तेरा
आँखों से धूप सेंक रही हूँ मैं
थक कर कभी इन अनजाने रास्तों पर
घुटनों पे अपने ही सर टेक रही हूँ मैं
आजकल कुछ अजीब सपने देख रही हूँ मैं....!!!

(गुंजन अग्रवाल "चारू" )



104 D--

आजकल मैं अजीब सपने देखती हूँ
खुद को ढूंड रही हू मैं कई सदियों से ..
हर शख्स  शहर मे मेरे चेहरे सा है ..
तोड कर ज़ंजीर मैं जेल से भाग गयी ..
और खुद से ही खुद को पकड़ कर वापस ले आयी..
वो मुझे पिंजरे से आज़ाद कर रहा था ..
और मैं हूँ कि रिहाई से डर रही हूँ ..



मर गयी मैं

तो हँस रहे सब लोग ..
जी गयी
तो रोने लगे सब लोग ..
ये कैसे माँ बाप देख रही हू मैं ..
कोख में  मर रही हू मैं
आजकल मैं अजीब सपने देखती हूँ ..


चाँद बुझा गया कोई

तारे तोड गया कोई
बादलों मे आकाशसीढी लगा के चढ़ रही हूँ
आजकल मैं अजीब सपने देख रही हूँ ..

(उत्कर्ष सिंह सोमवंशी )



104 E--

ख्वाबों  में वो सावन के झूले
तुम और मैं
मैं और तुम
एक दूसरे में हुए गुम

सोचता हूँ तुम्हे पा ही लूंगा

अपना तुम्हे बना ही लूंगा
अभी तो ख्वाबो में ही सजते हो तुम
दिल में मेरे बसते हो तुम

हर बूँद में अक्स तुम्हारा

हर आहट पे आने का एहसास
जाने कब ख्वाब होंगे पूरे कब मिलेगा तुम्हारा साथ....

(राजेश सिक्का )




104 F--

जागती आंख ने देखा सपना ।
तितलियां पंख दे गईं मुझको ।
और सैय्याद बेरहम हो कर ।
मेरे पंखों को नोंच देता है ।

(सरोज सिंह परिहार "सूरज" )

104 G--

लहुलुहान सड़क
आती है ख्वाब में हर दिन
झाड़ियों में बिखरे कपड़ों में
बिलखती भागती...

चाक सा घूमता है

दिल में मेरे
फिर भी कोई सूरत
क्यूँ नहीं निकलती...

लबों पर थरथराती

शबनम की बूंदें
गुलाबी जलन
ख्वाब अधूरा
छूने का...

वो टुकड़ा अधूरे ख़्वाब का

अटका हुआ है मन में 
किरचनों की कुरेदनी
से निकालने की कोशिश
धंसता जा रहा है
गहरे...और गहरे ...

आजकल कितने अजीब ख़्वाब देखती  हूँ  ना  मैं...

(अनिता शर्मा "अनु")




( Rough Draft )
ख्यालों के पंछी
दिल के आसमान में
रोज़ नयी
उड़ान भरते हैं

चार पल से
लदी हुई एक बैल गाड़ी
चाक के पहियों के
घिसे गुटिकाधार रंगीन

जहाँ की सभी दीवारों पे
रात दिन लगातार
खुरचती रहती हैं
तेरा नाम कुछ यादें

अपने ही अक्स में
मिली आँखों की सीढ़ियां
यादों के जाफरान मोहल्ले
गांव खलिहान मकान

अजीब से ख्वाब देखता हूँ मै
कितने नादान दिख रहे है अभी
वफा के सूख चुके दरिये में,
प्यार की मछलियों की चाहत मे,
जाल एहसास का डाले बैठे,
कितने तस्कीनजदा लगते हैं !!
अजीब ख्वाब देखता हूँ मै !!


समंदर दौड रहा नदी की तरफ ,
कैसा मंजर ,अजीब बात है न !
सूरज आमादा रात से मिलने
रात चुप क्यो अजीब रात है न !!
अजीब से ख्वाब देखता हूँ मै.

चलती ट्रेन के रुकने पे जब उतरता हूँ
एक भी शख्स प्लेटफार्म पर नहीं दिखता !
और तो और फिर निकलने को बाहर,
एक भी दरवाजा रास्ता नहीं दिखता !!
अजीब से ख्वाब देखता हूँ मै !!!


तपते सहरे में बेसिम्त भाग रहा है कौन
और ये किसके पीछे भाग रहा हूँ मैं भी
किसकी तलाश जहन मे यूँ तारी है कि
नींद मे होते हुये ऐसे जाग रहा हूँ मैं भी
अजीब से ख्वाब देखता हूँ मै.


आजकल
मै अजीब सपने देखती हू
खुद को ढुड रही हू मै कई सदियों से ..
हर शक्स शहर मे मेरे चेहेरे सा है ..
तोड कर ज़ंजीर मै जेल से भाग गयी ..
और खुद से ही खुद को पकड़ कर वापस ले आयी..
वो मुझे पिजरे से आज़ाद कर रहा था ..
और मै हू कि रिहाई से डर रही हू ..

आजकल
मै अजीब सपने देखती हू .
मर गयी मै
तो हँस रहे सब लोग ..
जी गयी
तो रोने लगे सब लोग ..
ये कैसे माँ बाप देख रही हू "मै" ..
कोख मे मर रही हू मै ..
आजकल ...
मै अजीब सपने देखती हू


ख्वाब मे बारहा दिखती है मुझे एक नदी
और नदी के पार से आवाज एक आती है
जानी पहचानी सी दर्दीली शीरानी आवाज
अजीब बात तभी नींद टूट जाती है
इन दिनो अजीब से ख्वाब देखता हूँ मै



लहुलुहान सड़क
आती है ख्वाब में हर दिन
झाड़ियों में बिखरे कपड़ों में
बिलखती भागती

चाक सा घूमता है
दिल में मेरे
फिर भी कोई सूरत
क्यूँ नहीं निकलती

चाँद बुझा गया कोई
तारे तोड गया कोई
बादलों मे आकाशसीढी लगा के चढ़ रही हूँ
आजकल ..
अजीब सपने देख रही हूँ ..


ख्वाब का टुकड़ा
अटका हुआ है मन में
किरचनों की कुरेदनी
से निकालने की कोशिश
धंसता जा रहा है
गहरे


तनहा-उधाडा भीड़ में
फ़ितरत-मशगूल अकेला
घूमता रहता हूँ
तुम भी कहीं हो शायद


खवाबो में वो सावन के झूले
तुम और मै,
मैं और तुम
एक दूसरे में हुए गुम


सोचता हूँ तुम्हे पा ही लूंगा
अपना तुम्हे बना ही लूंगा
अभी तो ख्वाबो में ही सजते हो तुम
दिल में मेरे बसते हो तुम


लबों पर थरथराती
शबनम की बूंदें
गुलाबी जलन
ख्वाब अधूरा
छूने का


हर बूँद में अक्स तुम्हारा
हर आहट पे आने का एहसास
जाने कब ख्वाब होंगे पूरे कब मिलेगा तुम्हारा साथ


जागती आंख ने देखा सपना ।
तितलियां पख दे गईं मुझको ।
और सैय्याद बेरहम हो कर ।
मेरे पंखों को नोंच देता है ।


नोंच कर फलक से सारे सितारों को
अपनी चुनर में सहेज रही हूँ मैं
और कभी तक कर रास्ता तेरा
आँखों से धूप सेंक रही हूँ मैं
थक कर कभी इन अनजाने रास्तों पर
घुटनों पे अपने ही सर टेक रही हूँ मैं
आजकल कुछ अजीब सपने देख रही हूँ मैं

(~सहभागिता - सुधीर पांडे,आनंद खत्री,अनिता शर्मा ,गुंजन अग्रवाल ,सरोज सिंह परिहार,उत्कर्ष सिंह सोमवंशी,राजेश सिक्का  )


















Friday, 29 April 2016

# 76 . सह भागिता हरिवंश राय बच्चन ~ चुपके से चाँद निकलता है

"कुछ काल सभी से मन बहला, आकाश सभी को छलता है"

"सोना चाँदी हो जाता है,
जस्ता बनकर खो जाता है,
पल-पहले नभ के राजा का अब पता कहाँ पर चलता है।
चुपके से चंदा ढ़लता है।" ~ हरिवंश राय बच्चन (चुपके से चाँद निकलता है)


रह-रह दरवाज़े की आगल को
आभास अंजोर का रहता है
चेहरा तेरा भी तकिये पर कुछ धुंधला-धुंधला दिखता है
दिन धीरे धीरे जलता है


ओढ़ थकन दिन भर की शब्
हर रोज़ झरोखे पर आकर
चुप चाप मुझे ही तकता है
कुछ कहता है न सुनता जब चुपके से चाँद निकलता है
बस खोया खोया रहता है


जब खो जाता है चैन कहीं
और नींद नहीं जब आती है
तन्हाई में दीदार मेरा, करने को खूब तड़पता है
पर जाग न जाए रात कहीं
आहें भरता है डरता है


चांदनी पिघलने लगती ज्यों
नदिया जैसी लहराती है
अरुणामयी शामें कुमकुम सिंदूरी सूरज बिंदिया है
संध्या के भाल चमकता है


बदली का रंग भी काला सा
चुभता अंतस में भाला सा
कहारता है नयनों से किन्तु अधरों से सहज रहता है
मन ही मन में पिघलता है


अलसाई आँखो का कोना..
जैसे बात बिना ही रोना..
नही सजन आये है अबतक, फिर आँचल क्यूँ ये गिरता है
चुपके से चाँद निकलता है


रातों की मधु का ख़ुमार सखी
उल्लास सुबह की सिन्दूरी
आखों के गीड़ से सनकर भी
एक सहर अपूर्व चाहत में बयार ले कर निकलता है
पर अतीत से नाते रखता है


सागर की लहरों में डूबा
हर शाम को सूरज होता है
अरूणोदय काली रातो को हर प्रथम रश्मि से खोता है
सपनों में रंग भरता है


सूरज अलमस्ती मे झूम झूम
धरती का कण कण चूम चूम
देखो कैसी बेफिक्री से हर रोज ही खूब मचलता है...
धरती का रंग बदलता है


रजनीगंधा रात महकती
रविप्रिया उषा खनकती है
कण- कण भर आस का सृष्टि जाग्रत नव सृजन को उमगती है
रूकता कब रथ सप्त अश्व वाला है


पंक्षी नभ मे गाते है
सब इधर उधर मँडराते है,
तारों से जगमग रात रात ढले
आकाश के चित्र पटल पे वो अकिंत यादें कर जाते है
सूरज हर रोज निकलता है

(सह-भागिता : पूजा श्रीवास्तव कनुप्रिया, सरोज सिंह परिहार, अनिता शर्मा, आनन्द खत्री, गुंजन अग्रवाल 'चारू', पूजा बंसल, सुधीर पांडे, उत्कर्ष सिंह सोमवंशी)




Monday, 25 April 2016

सह -भागिता # 27 -अक्स में ढूंढते हो क्या



अक्स में ढूंढते हो क्या
धुंआ-धुंआ हुआ चेहरा मेरा
रात धुले काजल की बिखरी लकीरें
आँखों में छिपी अनगिनत तस्वीरें

आंखें रखती हैं तेरा तारीफ-ए-बयां
यादों के मंजर सा बढ़ता कारवां

खिंचती नकेल, खुरों में रेत, सफर बेज़ुबां
दर-दर भटकता साया मेरा

खोया हुआ हम-साया मेरा
झलकते मिराज़ में ख्याल बदगुमान

लम्हा- लम्हा छूटता मुझसे 'मैं'
अब मेरा सहारा साकी और मय,

होली के फीकेपन से उभरता असल चेहरा
हर शक्स के सीने में दबा राज़ गहरा

अक्स में ढूंढते हो क्या
धुंआ धुंआ हुआ चेहरा मेरा


(सहभागिता - आनंद खत्री ,गुंजन अग्रवाल'चारू',अनिता शर्मा,राजेश सिक्का )




26/03/16

Sunday, 24 April 2016

सह भागिता #17- चींटी को आटा डालते बाबा के चेहरे की ख़ुशी



चींटी को आटा डालते बाबा के चेहरे की ख़ुशी
भूखों को खाना खिलाने की ख़ुशी

ख़ुशी से रूबरू होते गमों की बेरूखी
छप्पर से झांकती कतरा कतरा धूप सी ख़ुशी

मयकशीं आँखों को देख खाली प्यालों की ख़ुशी
जाम के फिर भर के छलक जाने की ख़ुशी

बिटिया की मांग में दमकती सिंदूरी ख़ुशी
हाथ में मेहंदी रच जाने की ख़ुशी

दाने चुग कर चहचहाती चिड़ियों की ख़ुशी
किसी के लौट आने की ख़ुशी

अंधेरे की रोशनी से हारने की ख़ुशी
अंधेरों में खुश्बू की क़ियादत की ख़ुशी

नज़रों से हुई इबादत की ख़ुशी
नज़रों को पढ़ मुस्कुराते लबों की ख़ुशी

तुमसे मिली हुई सारे ग़मों की ख़ुशी
रास्ता है सफर ज़िन्दगी हर ख़ुशी

शाम को समोसे के साथ चाय की ख़ुशी
पाकिस्तान से मिली जीत की ख़ुशी

थोड़े से प्यार और ज़्यादा सी मोहब्बत की ख़ुशी
सबको खुश देख कर खुश होने की ख़ुशी

दोस्तों की ख़ुशी अपनी ख़ुशी
इसी ख़ुशी में छुपी है सबकी ख़ुशी

श्वेत श्याम से रंगीन होती ख़ुशी
खुशी के बीज छिड़क,खुशी बोने की ख़ुशी...


(सह-भागिता - आनंद खत्री, अनिता शर्मा, राजेश सिक्का, विकास त्रिपाठी, फ़र्रुख नदीम,मो.शब्बीर)


20/03/16



सह-भागिता # 26 - वो हसीं मौसम, इबादत-रात और तुम



वो हसीं मौसम, इबादत-रात और तुम
सर्द हवाएं भीगे से जज्बात और तुम
बदलते मौसम एक सौगात और तुम
खनकती चूड़ियाँ तुम ख्याल और तुम
ख्याल मनुहार आया बुखार और तुम
न हो तुम और फिर भी मुझमें तुम
मेरे जीने की वजह बस तुम ही तुम
इश्क़ में हम और मोहब्बत में तुम
दूर भी तुम और पास भी तुम
उजागर हो गये जस्बात बेबात और तुम
छूये नर्म निगाहों से मेरे जज़्बात, रात और तुम
मुकम्मल हो गयी सभी फ़रियाद और तुम ..
गुज़रती रातों वो तारों की बारात और तुम...
रेगिस्तानी मृगतृष्णा से होकर भी नहीं तुम


(सह-भागिता - आनंद खत्री,अनिता शर्मा,गुंजन अग्रवाल 'चारू' ,रिपुदमन मागों ,राजेश सिक्का,विकास त्रिपाठी,उत्कर्ष सिंह सोमवंशी)


25/03/16


सह-भागिता #25 - एक आग सी है सीने में



एक आग सी है सीने में
जलती रही हरदम, बुझती नहीं...

खहिशों के तलातुम सी
सुलगती है, पर मचलती नहीं

सहज है, पर सुलझने में
बीतती है, बिसरती नहीं...

दरिया न बन जाये शोलों का कहीं
नब्ज़ देख चरागार उदास भी नहीं

एक ग़ुबार सा कुछ उठता है
इस दर्दे दिल की दवा भी नहीं

लगता है उसे न परवाह थी कभी
टूटा है जो अंदर, वो चुभता भी नहीं...

ढूंढता हूँ, पर दिखता क्या कभी
दिल-ए-आवाज़ हूँ, वो सुनता भी नहीं...

बन खुशबु महकता है मुझमें कभी,
तेरी यादों का, गुलदस्ता भी नहीं....

चाहे जब चुरा लो मुझसे,
सब तेरा है मेरा कुछ भी नहीं...

एक आग सी सुलगती है सीने में
पर धुंए के परे, कुछ भी नहीं.........

(सह-भागिता- विकास त्रिपाठी, गुंजन अग्रवाल 'चारू' , राजेश सिक्का, आनंद खत्री, अनिता शर्मा)
25/03/16



सह-भागिता # 24 - मन मृदंग हुआ, तन कसा सितार



मन मृदंग हुआ, तन कसा सितार
घर आया मेरे सज धज के रंगीला त्यौहार...

ख्वाइशों का नाद हुआ फाग की पुकार
वीणा बन ताल पे नाचे है जैसे झाँझ सितार...

राधा संग कृष्ण उड़े गुलाल अबीर की धार
काशी में खेले मथुरा में खेले मन का घर संसार...

कुछ तो करीब आओ करें मनुहार,
मुझको रंग दो अपने ही रंग में एक बार...

चिरयौवना के हों जाए सोलह श्रृंगार
हर एक श्रृंगार में छिपे रूप हज़ार


(सह-भागिता -रिपुदमन मागों,राजेश सिक्का,उत्कर्ष सिंह सोमवंशी, अनिता शर्मा,आनन्द खत्री)


24/03/16


सह-भागिता #23 - आख़िर एक दिन हम खुदा से मिले



आख़िर एक दिन हम खुदा से मिले
जाने किस मोड़ पे हम ख़ुदा से मिले

दिल में लिए थे कई शिकवे गिले
दर्द के लेकर सिले ख़ुदा से मिले

गला भरा सा था अश्क़ बस बहते रहे
बेआवाज़, बे-कसक हम ख़ुदा से मिले

होली पर मिलो गले, न रहे शिकवे गिले
रंग रेज़ हथेलियों में मिले हम खुदा से मिले

लब रहे खामोश क्यूँ जब खुदा से मिले
फाग गा रहे थे जब मिले खुदा से मिले

हाथ लकीरों लिए अब खुदा से गिले
ज़िक्र तेरा ही लेकर हम खुदा से मिले

मिटा कर हसरत ज़रुरत के सिलसिले
खुद को सौप दिया जब खुदा से मिले

वो खुदा है यह जाना कब जब उससे मिले
एक दूसरे को बनाने वाले खुदा से मिले

निकल गए थे बहुत दूर, खुद से बेख़बर
खुद की खबर मिली जब खुदा से मिले

(सह-भागिता- आनंद खत्री,गुंजन अग्रवाल 'चारू' ,विकास त्रिपाठी,अंजलि ओझा,अनिता शर्मा,राजेश सिक्का,रिपुदमन मागों,झिलमिल जैन)


23/03/16


सह-भागिता #16 - जिंदगी रंग लो अपनी होली के रंग से





जिंदगी रंग लो अपनी होली के रंग से
शोख़ चल रही है बयार फ़ागुन के संग से

रंगो, गुजिया, और भंग से,
मिलेंगे जब मेरे रंग तेरे रंग से,
रंग भरी आँखों में ख़याल से,
उड़ते गुलाल और रंग भरी फुहार से,
तेरे गालों में लगाना गुलाल बड़े प्यार से....

माल पुओं की चाशनी के ख्याल से,
जलेबी की तरह उलझी ज़िन्दगी के मलाल से,
रंग-ए-हसरत पान में किमाम से,
या रंगों में डूबी हर इक शाम से,
ख़ूब मीठी गुझिया और ठंडाई के जाम से....

सफेद चुनर को लहरिया बनाने से,
अंतर्मन को अपने भिगाने से,
भीग के फिर निखर जाने से,
छोड़ गए जो उनके न लौट आने से,
कहने, सुनने और मनाने से,
गुज़रे किस्सों को भूल जाने से....
दुश्मनों को अपना बनाने से....

धूप की इक बूँद के अल्हड़ छिटक जाने से
इन्द्रधनुष रंगों के ज़मीं पे उतर आने से,
उसको भींगाने और भींग जाने से,
मेरे गम में तेरी ख़ुशी से ख़ुशी...
ये समझने-समझाने से...
होली होती है, अपनों के करीब आने से...







(सह-भागिता - आनंद खत्री, विकास त्रिपाठी, राजेश सिक्का , गुंजन अग्रवाल 'चारू' , अनिता शर्मा, अंजलि ओझा, रिपुदमन मगों )


20/03/16

सह-भागिता #15 - यादों से कहो अपनी



यादों से कहो अपनी,
इबादत के वक्त तो ना सताए

खुदा को दूर रहने दे
ज़्यादा पास न लाए

खुदा में तू है, या तुझमें खुदा
ये भ्रम हमेशा सताए

सजदों में तेरे इतना दर्द,
पथराई आँखों थोड़ा तो भीग जाए

जुबां पे खुदा का नाम लाया नहीं
आये तुम्हारे ही दर पे सर झुकाए

तेरी रज़ा है, मार दे या तार दे,
क्या पता ख़ुदा बचाने घर आ जाए

ऐसी ही कारीगरी से वो भी बना खुदा है
नाम लबों से जुदा न हो, चाहे हम फ़ना हो जाएं

फुर्सत नहीं रहती तुम्हें है आज मिलने की
कयामत के दिन तो मिलोगे, ये वादा हो जाए

मुझसे मिलने को शायद वो भी बेकरार हो जाए,
गुमराह हैं जो सालों से उन्हें घर बार मिल जाए,

इन तरसती हुई आँखों को, अब क़रार मिल जाए....
शायद... मुझे मेरा यार मिल जाए....


(सह-भागिता - आनंद खत्री,अंजलि ओझा,अनिता शर्मा, राजेश सिक्का, गुंजन अग्रवाल 'चारू', विकास त्रिपाठी, प्रीती शर्मा)


19/03/16


सह-भागिता #7 - वजह मिलती नहीं हर रोज़ मिलने की



वजह मिलती नहीं हर रोज़ मिलने की,
ढूंढा करती हूँ तुमको ज़हन के रास्तों पर...

इस खोज को दिन का शौक बना बैठे हैं,
कभी रातों को जाग कर कभी तारे गिनकर
खुली आँखों से सोती हूँ तुम्हारे दीदार को
कुछ पल को भूल जाने का जी करता है ...

इन तैरते हुए ख्वाबों को कैसे रोकूँ बहने से
हर ख्वाब मेरा तुझ तक सफर करता है

ढूंढता है पगडंडियों पर तेरे निशान
न पा तुझे, बच्चों सा मचलता है
जिद्द है कैसी तुझे हासिल करने की
इस जस्ब को सलासिल बता गया कोई
ये दिल सिर्फ तेरे लिए ही धड़कता है....

फिर चला जाएगा छोड़ तुझे
ये वहम क्यों आता है दिल में
तू भी तो कभी बहला मुझको
अपनी आँखों में बसा मुझको


(सह-भागिता - गुंजन अग्रवाल 'चारू' , आनंद खत्री, अनिता शर्मा, राजेश सिक्का, विकास त्रिपाठी, अंजलि ओझा)

15/03/16


सह-भागिता #22- घुला दो नफ़रतें सभी रंगों में होली के



घुला दो नफ़रतें सभी रंगों में होली के
बदल रहा है मौसम रंगों में होली के

लगे नार नखरेदार पड़ोसन रंगों में होली के
टेसू रहे तलबगार तेरे रुखसार रंग में होली के

दे दो रंग लबों का उधार, मिला लें रंगों में होली के
भीगे लिबास में सहलाब मिलेंगे रंग होली के

रंग चुराये है गुलाल तेरे गालों से रंग में होली के
चंदन का लम्स इत्र तेरा साथ रंग होली के

पी के भंग नाचो गाओ उड़ाओ रंग होली के
उल्टे पांव लौटी उमरिया देख के रंग होली के

भीगी चुनरिया झीनी रंगों में होली के
अंग अंग फागुन हुआ, जो पिय ने डाले रंग होली के

आसमान भी रंगीन हो गया जब रंग उछाले होली के
 नये पात नये गान्थ रंग में होली के

बेकाम हैं औपचर सभी रंगों में होली के
पिघल रहा है अंतर्मन रंगो में होली के

ग़ज़ल हो रहा है संग रंग में होली के
योगिया बोले सारा रा रा रंग में होली के

धू-धू के चिलम खींच चरसी रंग में होली के
जला के माज़ी सारा नाचे रंग में होली के

सज़ा काट के आया है ३६४ दिन होली के
आया है आज दिन भीगे रंग में होली के


(सह-भागिता - आनंद खत्री, अनिता शर्मा, गुंजन अग्रवाल "चारू" ,विकास त्रिपाठी, राजेश सिक्का)


23/03/16



सह-भागिता #29 - टीन के डब्बों में बंद ज़िंदगी

टीन के डब्बों में बंद ज़िंदगी
'बेस्ट बिफोर एक्सपायरी' है ज़िंदगी

ज़िंदा होने का एहसास देती
मिठास से लाज़वाब बनाती है ज़िंदगी

धीरे धीरे संकरी सुराखों से सांस लेती
देखने में अच्छी पर दुश्वार है ये ज़िंदगी

ठग रही है झूठ-सच के खेल में...
सँभालते अस्ल बेअंजाम है ज़िन्दगी

बिकता है यहाँ सब कुछ नाम के लिए
ज़िंदा-मज़ाक, और मौत पर तंज़ ज़िंदगी

टीन के डब्बों में बंद ज़िंदगी


मधुकर को फूलों की मेजबानी करती
ज़िंदगी से खफा ज़िन्दगी की दीवानी ज़िंदगी

जैसे पत्तों पर जमा बारिश का पानी
एक सफ़र की तरह आनी जानी ज़िंदगी
बोतल में बंद खस-इत्र सी नादान 
ओस की बूंदों सी दीवानी ज़िंदगी

महकती प्यार के पहले पत्र सी
मेहबूबा के इंतज़ार में बैठे वक़्त सी ज़िन्दगी

एक टहनी, चार पत्ता, रास्ता है मेरा
कभी पतझड़ कभी बहार है ज़िंदगी

दरारों से झांकती धूप, आँखों की चौंधियाहट
सुख दुःख का है बस एक रूप जिंदगी

सितारों की छाप, लकीरों का अभिशाप है ज़िंदगी
जिसकी बेवफ़ाई उसी की दुआ है ज़िंदगी

(सह-भागिता- आनंद खत्री, अंजलि ओझा, राजेश सिक्का, फर्रूख़ नदीम, अनिता शर्मा, विकास त्रिपाठी)
27/03/16



सह-भागिता # 28 - बरगद की भांति खुद से खुद को उपजाता है मर्द



बरगद की भांति खुद से खुद को उपजाता है मर्द


ज़मीन को अपनी जड़ों से पकड़ता है मर्द

थोड़ा थोड़ा सबमें बंटता रहता दिनभर है मर्द
किसी बीज में सुपत प्रकृति के गर्भ में है मर्द
धुप में बरगद की छाओं सा फैला है मर्द
काष्ठ खोल नारियल बन भीतर तरलता है मर्द
सबको बाँहों में समेटे सुख का एहसास है मर्द
सख्त छाल, कम बाल, बल, और प्रतिकार है मर्द
बरसों तक बिना डिगे खड़े रहने का एहसास है मर्द
माँ का लाल, किसी का प्यार, दिलदार है मर्द
मन में दफनाए सैकड़ों दर्द और विचार है मर्द
शक्ति का शिव, प्रकृति को पुरुष है मर्द
सख्त रहे आसमां सा बादलों सा न बरस पाये है मर्द
कहने को कई बाते पर बिना कहे चुप रह जाए है मर्द
दिल में भरा सागर कभी आँखों से न छलकाए है मर्द
सब कुछ सहकर भी हमेशा मुस्कुराये है मर्द
इश्क़ में कैस, साहित्य को साहित्यकार है मर्द
अपने अंदर की औरत को छुपाये रहता है मर्द
मर्द होने के अहम में कभी कभी इतराये है मर्द
कविता का मात्रभार सौंदर्य का अधिकार है मर्द
सास - बहू की तुला साधता, मध्यस्थ है मर्द
नदी को तल, सूक्ष्म का साकार है मर्द
नटखट नज़र से सौन्दर्य पान को ललचाता है मर्द
महोब्बत में भी नहीं कभी सुधर पाता है मर्द
कभी-कभी मर्यादा पुरुषोत्तम भी बन जाता है मर्द
गोपियों का गोपाल, यशोदा का नन्दलाल मर्द
हीर का राँझा कभी सोहनी का महिवाल है मर्द
नर में नर, स्त्री का स्वयंवर-श्रृंगार है मर्द
हर ऋतुओं से लड़ता आगे बढ़ता जाता है मर्द
औरत का पालनहार हर आसार है मर्द
ब्रह्मा, विष्णु, महेश का अवतार है मर्द
कोमल वल्लरी को सख्त भुजाओं में थामता है मर्द
बनारसी सिल्क को साथ खद्दर-सूती-कुर्ते में है मर्द
लिये शीश हाथ रणभूमि की तलवार है मर्द
वक़्त आने पे भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, है मर्द
बाढ़ में बहने से जो रोके वो शिला वो चट्टान है मर्द
मांझी बन चट्टानों में रास्ता बना सकता है मर्द
लाठी, ऐनक, राखी, सिंदूर, शाना, है मर्द
कुछ रोता हुआ कभी कमज़ोरी छुपाता भी है मर्द





(सह-भागिता - आनंद खत्री, अनिता शर्मा, राजेश सिक्का, गुंजन अग्रवाल 'चारू', फार्रुख़ नदीम, विकास त्रिपाठी)


26/03/16


सह-भागिता #21 - दिल में हसरतों का अम्बार कुछ ज्यादा है....



दिल में हसरतों का अम्बार कुछ ज्यादा है
फागुन पर रंगों का अधिकार कुछ ज़्यादा है

होती कहाँ हैं हासिल सबको मुहब्बतें यहाँ,
चलती इसलिए मंदिरों की दूकान कुछ ज़्यादा हैं

माटी का इन्सां देखो हर ओर बिक रहा,
अंजाम की सोच इंसां परेशां कुछ ज्यादा है

आने वाली नस्ल का देखा जो कायदा,
अपनी सोच पर शर्मिंदगी कुछ ज्यादा है

ख़ुद से जूझने में फ़ना था जीस्त भी
नींदें हैं कम ख्वाब कुछ चलते ज्यादा हैं

अपने मोबाइल को सिराहना बना रखा है
कब आएगा पैगाम इंतज़ार कुछ ज्यादा है

हमारे शहर में अब भी खिजां का मौसम है
शज़र पर फूल कम खार कुछ ज्यादा हैं

परिंदों की परवाज़ बंधी सी रहती क्यों है
सैयाद ने भी रखें क़फ़स कुछ ज्यादा हैं

सूखी मिट्टी पे दरारें भी उभर आई हैं लेकिन
बेवजह आज आँखों में बरसात कुछ ज्यादा है

दवा तो मौजूद है हर मर्ज़ हर ज़ख्म की देखो
फिर भी पैमाने की ज़रूरत कल से ज्यादा है

ज़ख्म तो सब पुराने हो कर निशान बन गए
ग़म है की अब भी पलकों पे ताज़ा-ताज़ा है

दुनिया की भीड़ में ठहरे लम्हों के दरमियाँ
कतरा-कतरा ज़िन्दगी का ज़ौक़ आधा है

ग़मों में ढूंढते रहती हैं पता खुशियों मगर
कहीं रंगी तो कभी ज़िन्दगी में सादगी ज्यादा है

फिर चली आती हैं उम्मीदें लौट-लौट कर
न जाने ऊपर वाले ने रखा क्या इरादा है

अभी रेस में बचे हैं ग़मगीन पैरोँ के निशां
दवा मुझसे भी बीमार बहुत ही ज्यादा है

फिर नतीजा ढूंढते हैं मंज़िलें और रास्ते
एक रास्ता मैखाने, एक इबादतगाह जाता है

कहाँ है छाँव नीम की थके मुसाफ़िर के लिए
आबलापा को मेहनत औ मशक्कत ज़्यादा है

आसमां देता नहीं अब और सहारा उड़ने का
कटी पतंग एक, लूटने वाले गली में ज़्यादा हैं

चेहरों पे रोज़ सजा करते हैं मुखौटे नए नए
इंसान की सोच में भी दिखावा कुछ ज़्यादा है


(सह-भागिता-आनंद खत्री ,गुंजन अग्रवाल 'चारू' ,रिपुदमन मागों, अनिता शर्मा, राजेश सिक्का,प्रीती शर्मा, फर्रुख नदीम,मो.शब्बीर)


22/03/16


सह-भागिता #20 - देखते हैं, सोचते हैं पर अब दिल से काम नहीं लेते



देखते हैं, सोचते हैं पर अब दिल से काम नहीं लेते
सरेआम महफ़िल में अब उनका नाम नहीं लेते...

भूलते हैं ख्वाब में उनको हम कभी- कभी लेकिन ,
खोकर याद में उनकी मगर अब जाम नहीं लेते...

साथ चलने को रास्तों में धूप- छाँव न भी हो तो भी ,
ठहर कर हम दरख्तों का कभी एहसान नहीं लेते

बेनामी ओढ़ ली है हर तरफ के अंजाम की तरह,
अब हम किसी का दिल कभी एहसान नहीं लेते...

आईने में देख अक्स अपना तुझे पहचानते हम हैं
तेरी बेदिल अदाओं से कोई इलज़ाम नहीं लेते

चिराग़े सहर के बूते रहोगे कब तक जलोगे तुम
ये बात मेरी तुम क्यों कभी मान क्यों नहीं लेते...

देखो दिनों में शराफ़त की धूप उग आती है आज कल
जुगनुओं से रौशनी क्यों अब कभी उधार नहीं लेते

अफ़सोस रहेगा जब सोचोगे आइन्दा फिर कभी
गिरते हुए को चाहत से अब संभाल क्यों नहीं लेते

माज़ी अब बहुत रुलाता है ज़िंदगी हार क्यों नहीं देते
आइन्दा के तलातुम से कश्ती निकाल क्यूँ नहीं लेते

सुना है अदा से फिर मेरा नाम पुकार पूछता है कोई
अपने अंदर के "मैं" को हम सब मार क्यों नहीं लेते


(सह-भागिता - गुंजन अग्रवाल 'चारू' ,आनंद खत्री , अनिता शर्मा,राजेश सिक्का , विकास त्रिपाठी )


22/03/16