ख़ाक बनकर भी लिखेंगे दौर
हम अपना एक जहां बसाएंगे..
जलती रेत पे होंगे पैरों के निशाँ
लहरों से भी न कभी मिट पायेंगे..
बैठकर देखना तमाशा वक्त का
हम तो वक्त के आगे निकल जाएंगे..
आरज़ू की किताबत से क्या समझ पायेंगे
हम तो बस ऐसे ही जिए जाएंगे..
मत करना अफसोस, गर तन्हाइयां मिले
सच के रास्ते बिन परछाई भी चलते जाएँगे..
अपनी हसरतों को मंज़िल तक ले जाएंगे
खाक को गजल की स्याही बनायेंगे..
दाग दामन एक बहार में फिर से
दर्द की महफ़िल फिर सजायेंगे..
दहलीज़ पे दिए ना रखना रोशन
अब हम लौट के फिर न आयेंगे..
मुक़द्दर की राहों में घर बसायेंगे
फिर भी तुम्हे हम न भूल पाएंगे..
हर तजरीबे (तजुर्बे) पे
तुझको रज़ा पायेंगे..
(~सह-भागिता - आनंद खत्री, अनिता शर्मा, अन्जली ओझा, राजेश सिक्का, विकास त्रिपाठी)
17/03/16
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