Sunday, 24 April 2016

सह-भागिता #18 - ले तेरी बज़्म में हम, बे-नक़ाब हो ही गए



ले तेरी बज़्म में हम, बे-नक़ाब हो ही गए
डाली जो तूने नज़र, नायाब हो ही गए

ख़याल हकीकत से खूबसूरत न थे
और समय पे अस्ल से मिलते न थे

उस जामाज़ेब की ज़ौ के क्या कहने
के जिसके इश्क़ में, ख़ाना-ख़राब हो ही गए

जब भी मिले तो दिन बारा-वफ़ात हो गए
दरमियाँ हकीकत के, तुमको देखा तो ख्वाब हो गए

ए दिल्लगी तेरे इस जस्ब पे कई कैस बर्बाद हो गए
फितरत है लफ्जों की, नज़्म में ढले जज़्बात हो गए

क्यों तुमको सुनने वाले बेहिसाब हो गए
बुझे भी इस तरह कि आफताब हो गए

फिर दिल जले इक दौर की किताब हो गए
ज़रा सी ढील क्या मिली,पतंग आप हो गए


(सह-भागिता - आनंद खत्री, प्रीति शर्मा, अन्जली ओझा, अनिता शर्मा, रिपुदमन मागों , झिलमिल जैन)


21/03/16


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