Sunday, 24 April 2016

सह-भागिता #21 - दिल में हसरतों का अम्बार कुछ ज्यादा है....



दिल में हसरतों का अम्बार कुछ ज्यादा है
फागुन पर रंगों का अधिकार कुछ ज़्यादा है

होती कहाँ हैं हासिल सबको मुहब्बतें यहाँ,
चलती इसलिए मंदिरों की दूकान कुछ ज़्यादा हैं

माटी का इन्सां देखो हर ओर बिक रहा,
अंजाम की सोच इंसां परेशां कुछ ज्यादा है

आने वाली नस्ल का देखा जो कायदा,
अपनी सोच पर शर्मिंदगी कुछ ज्यादा है

ख़ुद से जूझने में फ़ना था जीस्त भी
नींदें हैं कम ख्वाब कुछ चलते ज्यादा हैं

अपने मोबाइल को सिराहना बना रखा है
कब आएगा पैगाम इंतज़ार कुछ ज्यादा है

हमारे शहर में अब भी खिजां का मौसम है
शज़र पर फूल कम खार कुछ ज्यादा हैं

परिंदों की परवाज़ बंधी सी रहती क्यों है
सैयाद ने भी रखें क़फ़स कुछ ज्यादा हैं

सूखी मिट्टी पे दरारें भी उभर आई हैं लेकिन
बेवजह आज आँखों में बरसात कुछ ज्यादा है

दवा तो मौजूद है हर मर्ज़ हर ज़ख्म की देखो
फिर भी पैमाने की ज़रूरत कल से ज्यादा है

ज़ख्म तो सब पुराने हो कर निशान बन गए
ग़म है की अब भी पलकों पे ताज़ा-ताज़ा है

दुनिया की भीड़ में ठहरे लम्हों के दरमियाँ
कतरा-कतरा ज़िन्दगी का ज़ौक़ आधा है

ग़मों में ढूंढते रहती हैं पता खुशियों मगर
कहीं रंगी तो कभी ज़िन्दगी में सादगी ज्यादा है

फिर चली आती हैं उम्मीदें लौट-लौट कर
न जाने ऊपर वाले ने रखा क्या इरादा है

अभी रेस में बचे हैं ग़मगीन पैरोँ के निशां
दवा मुझसे भी बीमार बहुत ही ज्यादा है

फिर नतीजा ढूंढते हैं मंज़िलें और रास्ते
एक रास्ता मैखाने, एक इबादतगाह जाता है

कहाँ है छाँव नीम की थके मुसाफ़िर के लिए
आबलापा को मेहनत औ मशक्कत ज़्यादा है

आसमां देता नहीं अब और सहारा उड़ने का
कटी पतंग एक, लूटने वाले गली में ज़्यादा हैं

चेहरों पे रोज़ सजा करते हैं मुखौटे नए नए
इंसान की सोच में भी दिखावा कुछ ज़्यादा है


(सह-भागिता-आनंद खत्री ,गुंजन अग्रवाल 'चारू' ,रिपुदमन मागों, अनिता शर्मा, राजेश सिक्का,प्रीती शर्मा, फर्रुख नदीम,मो.शब्बीर)


22/03/16


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