लोग मिलते बिछड़ते हैं रूठ जाते हैं....
यादों में फिर आकर सताते हैं....
मंज़िलें भूल रास्तों में बैठ जाते हैं,
जहाँ चौराहे, घर से पहले मिल जाते हैं.
ज़हन की गलियाँ भी अक्सर अजीब होती हैं
ख्याल खुद से ही टकरा के लौट जाते हैं
दिखता है हर तरफ चेहरा मेहबूब का सा,
हर एक दर पे तलबगार चले जाते हैं ...
तेरे ही ख़्वाब-ओ-ख़याल में यूँ अक्सर
अपने होने का असर ढूंढती रहती हूँ मैं
मेरे हाथों की लकीरों में तू लिखा है क्या?
कदम हर बार तेरी ओर चले आते हैं ।
तू मृगतृष्णा सा चहुंओर, पर कहीं भी नहीं
एक कशिश तेरी ओर मुझको खींच लाती है
मिल ना पाता मेरे दिल से कोई और तुझ सा
रास्ता तेरे घर का ढूंढ, लौट आते हैं
आज फिर तेरी बेवफ़ाई को माफ़ किया,
चलो फिर से एक घर नया बनाते हैं ...
सिलसिला चलता रहे रुठने मनाने का
एक दुसरे को समझने समझाने का...
आतिश-ए-करार से किसी को जलाने का,
सब्र की राह में फिर उसको आज़माने का....
दिलों की दूरियां ज़ाहिर हो न जाये कहीं
खेल है ये तो, शमा-परवाने का,
चलो चल कर फिर आग में नहा के आतें हैं...
आओ आज उसे फिर से जलाते है
एक और शाम का सौदा कर के आते हैं।
(सह-भागिता - राजेश सिक्का,विकास त्रिपाठी, चारु अग्रवाल, आनंद खत्री , अनिता शर्मा, फ़र्रूख़ नदीम, प्रीति शर्मा , अंजलि ओझा)
16/03/16
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