आख़िर एक दिन हम खुदा से मिले
जाने किस मोड़ पे हम ख़ुदा से मिले
दिल में लिए थे कई शिकवे गिले
दर्द के लेकर सिले ख़ुदा से मिले
गला भरा सा था अश्क़ बस बहते रहे
बेआवाज़, बे-कसक हम ख़ुदा से मिले
होली पर मिलो गले, न रहे शिकवे गिले
रंग रेज़ हथेलियों में मिले हम खुदा से मिले
लब रहे खामोश क्यूँ जब खुदा से मिले
फाग गा रहे थे जब मिले खुदा से मिले
हाथ लकीरों लिए अब खुदा से गिले
ज़िक्र तेरा ही लेकर हम खुदा से मिले
मिटा कर हसरत ज़रुरत के सिलसिले
खुद को सौप दिया जब खुदा से मिले
वो खुदा है यह जाना कब जब उससे मिले
एक दूसरे को बनाने वाले खुदा से मिले
निकल गए थे बहुत दूर, खुद से बेख़बर
खुद की खबर मिली जब खुदा से मिले
(सह-भागिता- आनंद खत्री,गुंजन अग्रवाल 'चारू' ,विकास त्रिपाठी,अंजलि ओझा,अनिता शर्मा,राजेश सिक्का,रिपुदमन मागों,झिलमिल जैन)
23/03/16

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