Saturday, 23 April 2016

सहभागिता #6 - मोतियों की चादर झटक गया कोई



मोतियों की चादर झटक गया कोई
जैसे बेजार सपना ले रहा उधार कोई

अब कौन समेटेगा मुझको आ कर
मुझको बिखरा के चल दिया कोई

आसमाँ की परात से बिछड़ा तारा हूँ
पत्थर समझ क्यों ठुकरा गया कोई

जवाहिर कोयले की ख़ाक में पल बढ़ा
कोहिनूर सम्राटों के सर चढ़ा गया कोई

आग है सीने में, तो चमकता है वो
आग में तपा के सोना बना गया कोई

जाने किस रिश्ते के गहने सा सजा हूँ मैं
रूठा था खुद से...खुद से मिला गया कोई

बिछुआ, मंगलसूत्र, चूड़ा बन सज गया कोई
इस नाचीज़ को बेशकीमती बना गया कोई

रिश्तों को कुंदन की कीमत बताना अजब
कांच को कोहिनूर फिर बना गया कोई

सुलगता था शरारे सा दिल में इस कदर
दिल सुलगने की चीज़ थी जता गया कोई

मद्धम आँच पर चढ़ाओ इश्क़ की हांडी
इश्क़ बीरबल की हांड़ी, पका गया है कोई

कहते है उड़ जाती है इश्क़ में नींदें
आँखों की तिजोरी से ख्वाब चुरा गया कोई

इक वही तो आसरा रह गया जीने का
और उस को बेसिर बता गया कोई

अब इस दुनिया में किसका करे ऐतबार
जब अपना दिल ही हो गया और कोई...


(सह-भागिता -आनंद खत्री, अनिता शर्मा, गुंजन अग्रवाल 'चारू', अन्जली ओझा, राजेश सिक्का,प्रीति शर्मा)


15/03/16





No comments:

Post a Comment