बहती नदिया दरिया के घर
हम मिलते फिर उस मिट्टी में
जाने किस संजोग से देखो
फिर मिली हो दिल ग़रज़ी में
बीता गुज़रा मौसम सा है
इस उम्र में तुमसे मिलने में
मेड़ बना कर सींचा तुमको
यादें भर पोली मिटटी में
तर रखता था गर्मी में भी
सूखा सौंधा एक चिट्ठी में
सूनापन एक महक सा देखो
सजता घर के हर कोने में
आँखें धुंधली कर बैठा हूँ
बरसों बंद तिजोरी में
हम तक कोई आहट आयी
तेरी आस थी उस झोली में
ये कैसी उम्र में मिली हो मुझसे ..................
~ सूफ़ी बेनाम

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