Saturday, 23 April 2016

सह-भागिता #5 - जवाब लेने आये शाम ए महफ़िल में



जवाब लेने आये शाम ए महफ़िल में,
उस लौ की जलन पे सवाल टूट गया..

नज़र पे रेंगती रहीं शुआएं इस कदर
मै अब्र का मानिन्द था फिर भी पिघल गया..

दीये को वो कब तलक जलाये रखेगा
शायद अंदाज़-ए-लौ जिस्म में ढल गया...

अंधेरों से कब तलक टकराएगा
क्यों नहीं दरिया के उस पार पहुंच गया ..

शोखियां भी पिघली शाम के दामन में
कोई तिश्नगी का साथ कब तक निभाएगा...

फिर किसने छेड़ा ज़िक्र उसका ...
शायद आज भी पैमाना छलक जायेगा

ख्वाबो की मिट्टी भिगोना छींटों से
बिरवा फिर कोई नया जाग पायेगा ...

आएगा दर पे तेरे सजदे को,
फिर भी सर न वो झुकाएगा

नज़र से तस्लीम नज़र को करना
अदब का तकाज़ा नज़रअंदाज़ हो जायेगा

पानी सी नज़र लिए बैठा है वो
सादगी सी उसकी आँख नम हो जायेगा

हौसलों से उसे नज़्म में लिख देना
वर्ना कोई और सितम बहार लायेगा

ख्वाब को असल तक हमदम ला देना
चाँद का पैरहन, सितारों को दामन बन जायेगा

रंग सुबह की लाली का उतर जाये जब
हथेली पर आँधियों सी हिना महकायेगा

आसमाँ दबे आफ़ताब को हमनवा करना
खिले सुबह कली तो उम्र की दुआ लाएगा

हम तो हैं सफ़र में,
मंज़िल मिले ये भी दुआ करना...


(~ सह-भागिता - उत्कर्ष सिंह सोमवंशी,आनन्द खत्री, विकास त्रिपाठी, अनिता शर्मा, राजेश सिक्का, अंजलि ओझा)


14/03/16




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