मन मृदंग हुआ, तन कसा सितार
घर आया मेरे सज धज के रंगीला त्यौहार...
ख्वाइशों का नाद हुआ फाग की पुकार
वीणा बन ताल पे नाचे है जैसे झाँझ सितार...
राधा संग कृष्ण उड़े गुलाल अबीर की धार
काशी में खेले मथुरा में खेले मन का घर संसार...
कुछ तो करीब आओ करें मनुहार,
मुझको रंग दो अपने ही रंग में एक बार...
चिरयौवना के हों जाए सोलह श्रृंगार
हर एक श्रृंगार में छिपे रूप हज़ार
(सह-भागिता -रिपुदमन मागों,राजेश सिक्का,उत्कर्ष सिंह सोमवंशी, अनिता शर्मा,आनन्द खत्री)
24/03/16

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