नहीं उम्मीद से उम्मीद कोई
नहीं भाती हैं जो खुशियाँ संजोई
पड़ी हैं झुर्रियां गालों पे अब तो
दरारे उँगलियों पे आ गयीं हैं
हुए मोहताज चश्मे के नज़ारे
घनी जुल्फें सफ़ेदी पा चुकी हैं
कलाई कांपती रहती है हरदम
पकड़ कमज़ोर अब होने लगी है
उमर भी शाम की देहलीज़ पर अब
थकन को ओढ़कर सोने चली है
हिसाबों में उलझकर खोया जीवन
नहीं मालूम क्या पाया गंवाया
मगर जोड़ी थी पायी पायी खुशियाँ
उन्हें भी अपने अपनों पर लुटाया
सुनो ए आखिरी उम्मीद मेरी
ये जिद पर क्यूँ अड़ी हो तुम
अगर कुछ पहले मिलतीं बात भी थी
ये कैसी उम्र में आकर मिली हो तुम
~ पूजा श्रीवास्तव कनुप्रिया

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