Friday, 29 April 2016

# 76 . सह भागिता हरिवंश राय बच्चन ~ चुपके से चाँद निकलता है

"कुछ काल सभी से मन बहला, आकाश सभी को छलता है"

"सोना चाँदी हो जाता है,
जस्ता बनकर खो जाता है,
पल-पहले नभ के राजा का अब पता कहाँ पर चलता है।
चुपके से चंदा ढ़लता है।" ~ हरिवंश राय बच्चन (चुपके से चाँद निकलता है)


रह-रह दरवाज़े की आगल को
आभास अंजोर का रहता है
चेहरा तेरा भी तकिये पर कुछ धुंधला-धुंधला दिखता है
दिन धीरे धीरे जलता है


ओढ़ थकन दिन भर की शब्
हर रोज़ झरोखे पर आकर
चुप चाप मुझे ही तकता है
कुछ कहता है न सुनता जब चुपके से चाँद निकलता है
बस खोया खोया रहता है


जब खो जाता है चैन कहीं
और नींद नहीं जब आती है
तन्हाई में दीदार मेरा, करने को खूब तड़पता है
पर जाग न जाए रात कहीं
आहें भरता है डरता है


चांदनी पिघलने लगती ज्यों
नदिया जैसी लहराती है
अरुणामयी शामें कुमकुम सिंदूरी सूरज बिंदिया है
संध्या के भाल चमकता है


बदली का रंग भी काला सा
चुभता अंतस में भाला सा
कहारता है नयनों से किन्तु अधरों से सहज रहता है
मन ही मन में पिघलता है


अलसाई आँखो का कोना..
जैसे बात बिना ही रोना..
नही सजन आये है अबतक, फिर आँचल क्यूँ ये गिरता है
चुपके से चाँद निकलता है


रातों की मधु का ख़ुमार सखी
उल्लास सुबह की सिन्दूरी
आखों के गीड़ से सनकर भी
एक सहर अपूर्व चाहत में बयार ले कर निकलता है
पर अतीत से नाते रखता है


सागर की लहरों में डूबा
हर शाम को सूरज होता है
अरूणोदय काली रातो को हर प्रथम रश्मि से खोता है
सपनों में रंग भरता है


सूरज अलमस्ती मे झूम झूम
धरती का कण कण चूम चूम
देखो कैसी बेफिक्री से हर रोज ही खूब मचलता है...
धरती का रंग बदलता है


रजनीगंधा रात महकती
रविप्रिया उषा खनकती है
कण- कण भर आस का सृष्टि जाग्रत नव सृजन को उमगती है
रूकता कब रथ सप्त अश्व वाला है


पंक्षी नभ मे गाते है
सब इधर उधर मँडराते है,
तारों से जगमग रात रात ढले
आकाश के चित्र पटल पे वो अकिंत यादें कर जाते है
सूरज हर रोज निकलता है

(सह-भागिता : पूजा श्रीवास्तव कनुप्रिया, सरोज सिंह परिहार, अनिता शर्मा, आनन्द खत्री, गुंजन अग्रवाल 'चारू', पूजा बंसल, सुधीर पांडे, उत्कर्ष सिंह सोमवंशी)




Monday, 25 April 2016

सह -भागिता # 27 -अक्स में ढूंढते हो क्या



अक्स में ढूंढते हो क्या
धुंआ-धुंआ हुआ चेहरा मेरा
रात धुले काजल की बिखरी लकीरें
आँखों में छिपी अनगिनत तस्वीरें

आंखें रखती हैं तेरा तारीफ-ए-बयां
यादों के मंजर सा बढ़ता कारवां

खिंचती नकेल, खुरों में रेत, सफर बेज़ुबां
दर-दर भटकता साया मेरा

खोया हुआ हम-साया मेरा
झलकते मिराज़ में ख्याल बदगुमान

लम्हा- लम्हा छूटता मुझसे 'मैं'
अब मेरा सहारा साकी और मय,

होली के फीकेपन से उभरता असल चेहरा
हर शक्स के सीने में दबा राज़ गहरा

अक्स में ढूंढते हो क्या
धुंआ धुंआ हुआ चेहरा मेरा


(सहभागिता - आनंद खत्री ,गुंजन अग्रवाल'चारू',अनिता शर्मा,राजेश सिक्का )




26/03/16

Sunday, 24 April 2016

सह भागिता #17- चींटी को आटा डालते बाबा के चेहरे की ख़ुशी



चींटी को आटा डालते बाबा के चेहरे की ख़ुशी
भूखों को खाना खिलाने की ख़ुशी

ख़ुशी से रूबरू होते गमों की बेरूखी
छप्पर से झांकती कतरा कतरा धूप सी ख़ुशी

मयकशीं आँखों को देख खाली प्यालों की ख़ुशी
जाम के फिर भर के छलक जाने की ख़ुशी

बिटिया की मांग में दमकती सिंदूरी ख़ुशी
हाथ में मेहंदी रच जाने की ख़ुशी

दाने चुग कर चहचहाती चिड़ियों की ख़ुशी
किसी के लौट आने की ख़ुशी

अंधेरे की रोशनी से हारने की ख़ुशी
अंधेरों में खुश्बू की क़ियादत की ख़ुशी

नज़रों से हुई इबादत की ख़ुशी
नज़रों को पढ़ मुस्कुराते लबों की ख़ुशी

तुमसे मिली हुई सारे ग़मों की ख़ुशी
रास्ता है सफर ज़िन्दगी हर ख़ुशी

शाम को समोसे के साथ चाय की ख़ुशी
पाकिस्तान से मिली जीत की ख़ुशी

थोड़े से प्यार और ज़्यादा सी मोहब्बत की ख़ुशी
सबको खुश देख कर खुश होने की ख़ुशी

दोस्तों की ख़ुशी अपनी ख़ुशी
इसी ख़ुशी में छुपी है सबकी ख़ुशी

श्वेत श्याम से रंगीन होती ख़ुशी
खुशी के बीज छिड़क,खुशी बोने की ख़ुशी...


(सह-भागिता - आनंद खत्री, अनिता शर्मा, राजेश सिक्का, विकास त्रिपाठी, फ़र्रुख नदीम,मो.शब्बीर)


20/03/16



सह-भागिता # 26 - वो हसीं मौसम, इबादत-रात और तुम



वो हसीं मौसम, इबादत-रात और तुम
सर्द हवाएं भीगे से जज्बात और तुम
बदलते मौसम एक सौगात और तुम
खनकती चूड़ियाँ तुम ख्याल और तुम
ख्याल मनुहार आया बुखार और तुम
न हो तुम और फिर भी मुझमें तुम
मेरे जीने की वजह बस तुम ही तुम
इश्क़ में हम और मोहब्बत में तुम
दूर भी तुम और पास भी तुम
उजागर हो गये जस्बात बेबात और तुम
छूये नर्म निगाहों से मेरे जज़्बात, रात और तुम
मुकम्मल हो गयी सभी फ़रियाद और तुम ..
गुज़रती रातों वो तारों की बारात और तुम...
रेगिस्तानी मृगतृष्णा से होकर भी नहीं तुम


(सह-भागिता - आनंद खत्री,अनिता शर्मा,गुंजन अग्रवाल 'चारू' ,रिपुदमन मागों ,राजेश सिक्का,विकास त्रिपाठी,उत्कर्ष सिंह सोमवंशी)


25/03/16


सह-भागिता #25 - एक आग सी है सीने में



एक आग सी है सीने में
जलती रही हरदम, बुझती नहीं...

खहिशों के तलातुम सी
सुलगती है, पर मचलती नहीं

सहज है, पर सुलझने में
बीतती है, बिसरती नहीं...

दरिया न बन जाये शोलों का कहीं
नब्ज़ देख चरागार उदास भी नहीं

एक ग़ुबार सा कुछ उठता है
इस दर्दे दिल की दवा भी नहीं

लगता है उसे न परवाह थी कभी
टूटा है जो अंदर, वो चुभता भी नहीं...

ढूंढता हूँ, पर दिखता क्या कभी
दिल-ए-आवाज़ हूँ, वो सुनता भी नहीं...

बन खुशबु महकता है मुझमें कभी,
तेरी यादों का, गुलदस्ता भी नहीं....

चाहे जब चुरा लो मुझसे,
सब तेरा है मेरा कुछ भी नहीं...

एक आग सी सुलगती है सीने में
पर धुंए के परे, कुछ भी नहीं.........

(सह-भागिता- विकास त्रिपाठी, गुंजन अग्रवाल 'चारू' , राजेश सिक्का, आनंद खत्री, अनिता शर्मा)
25/03/16



सह-भागिता # 24 - मन मृदंग हुआ, तन कसा सितार



मन मृदंग हुआ, तन कसा सितार
घर आया मेरे सज धज के रंगीला त्यौहार...

ख्वाइशों का नाद हुआ फाग की पुकार
वीणा बन ताल पे नाचे है जैसे झाँझ सितार...

राधा संग कृष्ण उड़े गुलाल अबीर की धार
काशी में खेले मथुरा में खेले मन का घर संसार...

कुछ तो करीब आओ करें मनुहार,
मुझको रंग दो अपने ही रंग में एक बार...

चिरयौवना के हों जाए सोलह श्रृंगार
हर एक श्रृंगार में छिपे रूप हज़ार


(सह-भागिता -रिपुदमन मागों,राजेश सिक्का,उत्कर्ष सिंह सोमवंशी, अनिता शर्मा,आनन्द खत्री)


24/03/16


सह-भागिता #23 - आख़िर एक दिन हम खुदा से मिले



आख़िर एक दिन हम खुदा से मिले
जाने किस मोड़ पे हम ख़ुदा से मिले

दिल में लिए थे कई शिकवे गिले
दर्द के लेकर सिले ख़ुदा से मिले

गला भरा सा था अश्क़ बस बहते रहे
बेआवाज़, बे-कसक हम ख़ुदा से मिले

होली पर मिलो गले, न रहे शिकवे गिले
रंग रेज़ हथेलियों में मिले हम खुदा से मिले

लब रहे खामोश क्यूँ जब खुदा से मिले
फाग गा रहे थे जब मिले खुदा से मिले

हाथ लकीरों लिए अब खुदा से गिले
ज़िक्र तेरा ही लेकर हम खुदा से मिले

मिटा कर हसरत ज़रुरत के सिलसिले
खुद को सौप दिया जब खुदा से मिले

वो खुदा है यह जाना कब जब उससे मिले
एक दूसरे को बनाने वाले खुदा से मिले

निकल गए थे बहुत दूर, खुद से बेख़बर
खुद की खबर मिली जब खुदा से मिले

(सह-भागिता- आनंद खत्री,गुंजन अग्रवाल 'चारू' ,विकास त्रिपाठी,अंजलि ओझा,अनिता शर्मा,राजेश सिक्का,रिपुदमन मागों,झिलमिल जैन)


23/03/16


सह-भागिता #16 - जिंदगी रंग लो अपनी होली के रंग से





जिंदगी रंग लो अपनी होली के रंग से
शोख़ चल रही है बयार फ़ागुन के संग से

रंगो, गुजिया, और भंग से,
मिलेंगे जब मेरे रंग तेरे रंग से,
रंग भरी आँखों में ख़याल से,
उड़ते गुलाल और रंग भरी फुहार से,
तेरे गालों में लगाना गुलाल बड़े प्यार से....

माल पुओं की चाशनी के ख्याल से,
जलेबी की तरह उलझी ज़िन्दगी के मलाल से,
रंग-ए-हसरत पान में किमाम से,
या रंगों में डूबी हर इक शाम से,
ख़ूब मीठी गुझिया और ठंडाई के जाम से....

सफेद चुनर को लहरिया बनाने से,
अंतर्मन को अपने भिगाने से,
भीग के फिर निखर जाने से,
छोड़ गए जो उनके न लौट आने से,
कहने, सुनने और मनाने से,
गुज़रे किस्सों को भूल जाने से....
दुश्मनों को अपना बनाने से....

धूप की इक बूँद के अल्हड़ छिटक जाने से
इन्द्रधनुष रंगों के ज़मीं पे उतर आने से,
उसको भींगाने और भींग जाने से,
मेरे गम में तेरी ख़ुशी से ख़ुशी...
ये समझने-समझाने से...
होली होती है, अपनों के करीब आने से...







(सह-भागिता - आनंद खत्री, विकास त्रिपाठी, राजेश सिक्का , गुंजन अग्रवाल 'चारू' , अनिता शर्मा, अंजलि ओझा, रिपुदमन मगों )


20/03/16

सह-भागिता #15 - यादों से कहो अपनी



यादों से कहो अपनी,
इबादत के वक्त तो ना सताए

खुदा को दूर रहने दे
ज़्यादा पास न लाए

खुदा में तू है, या तुझमें खुदा
ये भ्रम हमेशा सताए

सजदों में तेरे इतना दर्द,
पथराई आँखों थोड़ा तो भीग जाए

जुबां पे खुदा का नाम लाया नहीं
आये तुम्हारे ही दर पे सर झुकाए

तेरी रज़ा है, मार दे या तार दे,
क्या पता ख़ुदा बचाने घर आ जाए

ऐसी ही कारीगरी से वो भी बना खुदा है
नाम लबों से जुदा न हो, चाहे हम फ़ना हो जाएं

फुर्सत नहीं रहती तुम्हें है आज मिलने की
कयामत के दिन तो मिलोगे, ये वादा हो जाए

मुझसे मिलने को शायद वो भी बेकरार हो जाए,
गुमराह हैं जो सालों से उन्हें घर बार मिल जाए,

इन तरसती हुई आँखों को, अब क़रार मिल जाए....
शायद... मुझे मेरा यार मिल जाए....


(सह-भागिता - आनंद खत्री,अंजलि ओझा,अनिता शर्मा, राजेश सिक्का, गुंजन अग्रवाल 'चारू', विकास त्रिपाठी, प्रीती शर्मा)


19/03/16


सह-भागिता #7 - वजह मिलती नहीं हर रोज़ मिलने की



वजह मिलती नहीं हर रोज़ मिलने की,
ढूंढा करती हूँ तुमको ज़हन के रास्तों पर...

इस खोज को दिन का शौक बना बैठे हैं,
कभी रातों को जाग कर कभी तारे गिनकर
खुली आँखों से सोती हूँ तुम्हारे दीदार को
कुछ पल को भूल जाने का जी करता है ...

इन तैरते हुए ख्वाबों को कैसे रोकूँ बहने से
हर ख्वाब मेरा तुझ तक सफर करता है

ढूंढता है पगडंडियों पर तेरे निशान
न पा तुझे, बच्चों सा मचलता है
जिद्द है कैसी तुझे हासिल करने की
इस जस्ब को सलासिल बता गया कोई
ये दिल सिर्फ तेरे लिए ही धड़कता है....

फिर चला जाएगा छोड़ तुझे
ये वहम क्यों आता है दिल में
तू भी तो कभी बहला मुझको
अपनी आँखों में बसा मुझको


(सह-भागिता - गुंजन अग्रवाल 'चारू' , आनंद खत्री, अनिता शर्मा, राजेश सिक्का, विकास त्रिपाठी, अंजलि ओझा)

15/03/16


सह-भागिता #22- घुला दो नफ़रतें सभी रंगों में होली के



घुला दो नफ़रतें सभी रंगों में होली के
बदल रहा है मौसम रंगों में होली के

लगे नार नखरेदार पड़ोसन रंगों में होली के
टेसू रहे तलबगार तेरे रुखसार रंग में होली के

दे दो रंग लबों का उधार, मिला लें रंगों में होली के
भीगे लिबास में सहलाब मिलेंगे रंग होली के

रंग चुराये है गुलाल तेरे गालों से रंग में होली के
चंदन का लम्स इत्र तेरा साथ रंग होली के

पी के भंग नाचो गाओ उड़ाओ रंग होली के
उल्टे पांव लौटी उमरिया देख के रंग होली के

भीगी चुनरिया झीनी रंगों में होली के
अंग अंग फागुन हुआ, जो पिय ने डाले रंग होली के

आसमान भी रंगीन हो गया जब रंग उछाले होली के
 नये पात नये गान्थ रंग में होली के

बेकाम हैं औपचर सभी रंगों में होली के
पिघल रहा है अंतर्मन रंगो में होली के

ग़ज़ल हो रहा है संग रंग में होली के
योगिया बोले सारा रा रा रंग में होली के

धू-धू के चिलम खींच चरसी रंग में होली के
जला के माज़ी सारा नाचे रंग में होली के

सज़ा काट के आया है ३६४ दिन होली के
आया है आज दिन भीगे रंग में होली के


(सह-भागिता - आनंद खत्री, अनिता शर्मा, गुंजन अग्रवाल "चारू" ,विकास त्रिपाठी, राजेश सिक्का)


23/03/16



सह-भागिता #29 - टीन के डब्बों में बंद ज़िंदगी

टीन के डब्बों में बंद ज़िंदगी
'बेस्ट बिफोर एक्सपायरी' है ज़िंदगी

ज़िंदा होने का एहसास देती
मिठास से लाज़वाब बनाती है ज़िंदगी

धीरे धीरे संकरी सुराखों से सांस लेती
देखने में अच्छी पर दुश्वार है ये ज़िंदगी

ठग रही है झूठ-सच के खेल में...
सँभालते अस्ल बेअंजाम है ज़िन्दगी

बिकता है यहाँ सब कुछ नाम के लिए
ज़िंदा-मज़ाक, और मौत पर तंज़ ज़िंदगी

टीन के डब्बों में बंद ज़िंदगी


मधुकर को फूलों की मेजबानी करती
ज़िंदगी से खफा ज़िन्दगी की दीवानी ज़िंदगी

जैसे पत्तों पर जमा बारिश का पानी
एक सफ़र की तरह आनी जानी ज़िंदगी
बोतल में बंद खस-इत्र सी नादान 
ओस की बूंदों सी दीवानी ज़िंदगी

महकती प्यार के पहले पत्र सी
मेहबूबा के इंतज़ार में बैठे वक़्त सी ज़िन्दगी

एक टहनी, चार पत्ता, रास्ता है मेरा
कभी पतझड़ कभी बहार है ज़िंदगी

दरारों से झांकती धूप, आँखों की चौंधियाहट
सुख दुःख का है बस एक रूप जिंदगी

सितारों की छाप, लकीरों का अभिशाप है ज़िंदगी
जिसकी बेवफ़ाई उसी की दुआ है ज़िंदगी

(सह-भागिता- आनंद खत्री, अंजलि ओझा, राजेश सिक्का, फर्रूख़ नदीम, अनिता शर्मा, विकास त्रिपाठी)
27/03/16



सह-भागिता # 28 - बरगद की भांति खुद से खुद को उपजाता है मर्द



बरगद की भांति खुद से खुद को उपजाता है मर्द


ज़मीन को अपनी जड़ों से पकड़ता है मर्द

थोड़ा थोड़ा सबमें बंटता रहता दिनभर है मर्द
किसी बीज में सुपत प्रकृति के गर्भ में है मर्द
धुप में बरगद की छाओं सा फैला है मर्द
काष्ठ खोल नारियल बन भीतर तरलता है मर्द
सबको बाँहों में समेटे सुख का एहसास है मर्द
सख्त छाल, कम बाल, बल, और प्रतिकार है मर्द
बरसों तक बिना डिगे खड़े रहने का एहसास है मर्द
माँ का लाल, किसी का प्यार, दिलदार है मर्द
मन में दफनाए सैकड़ों दर्द और विचार है मर्द
शक्ति का शिव, प्रकृति को पुरुष है मर्द
सख्त रहे आसमां सा बादलों सा न बरस पाये है मर्द
कहने को कई बाते पर बिना कहे चुप रह जाए है मर्द
दिल में भरा सागर कभी आँखों से न छलकाए है मर्द
सब कुछ सहकर भी हमेशा मुस्कुराये है मर्द
इश्क़ में कैस, साहित्य को साहित्यकार है मर्द
अपने अंदर की औरत को छुपाये रहता है मर्द
मर्द होने के अहम में कभी कभी इतराये है मर्द
कविता का मात्रभार सौंदर्य का अधिकार है मर्द
सास - बहू की तुला साधता, मध्यस्थ है मर्द
नदी को तल, सूक्ष्म का साकार है मर्द
नटखट नज़र से सौन्दर्य पान को ललचाता है मर्द
महोब्बत में भी नहीं कभी सुधर पाता है मर्द
कभी-कभी मर्यादा पुरुषोत्तम भी बन जाता है मर्द
गोपियों का गोपाल, यशोदा का नन्दलाल मर्द
हीर का राँझा कभी सोहनी का महिवाल है मर्द
नर में नर, स्त्री का स्वयंवर-श्रृंगार है मर्द
हर ऋतुओं से लड़ता आगे बढ़ता जाता है मर्द
औरत का पालनहार हर आसार है मर्द
ब्रह्मा, विष्णु, महेश का अवतार है मर्द
कोमल वल्लरी को सख्त भुजाओं में थामता है मर्द
बनारसी सिल्क को साथ खद्दर-सूती-कुर्ते में है मर्द
लिये शीश हाथ रणभूमि की तलवार है मर्द
वक़्त आने पे भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, है मर्द
बाढ़ में बहने से जो रोके वो शिला वो चट्टान है मर्द
मांझी बन चट्टानों में रास्ता बना सकता है मर्द
लाठी, ऐनक, राखी, सिंदूर, शाना, है मर्द
कुछ रोता हुआ कभी कमज़ोरी छुपाता भी है मर्द





(सह-भागिता - आनंद खत्री, अनिता शर्मा, राजेश सिक्का, गुंजन अग्रवाल 'चारू', फार्रुख़ नदीम, विकास त्रिपाठी)


26/03/16


सह-भागिता #21 - दिल में हसरतों का अम्बार कुछ ज्यादा है....



दिल में हसरतों का अम्बार कुछ ज्यादा है
फागुन पर रंगों का अधिकार कुछ ज़्यादा है

होती कहाँ हैं हासिल सबको मुहब्बतें यहाँ,
चलती इसलिए मंदिरों की दूकान कुछ ज़्यादा हैं

माटी का इन्सां देखो हर ओर बिक रहा,
अंजाम की सोच इंसां परेशां कुछ ज्यादा है

आने वाली नस्ल का देखा जो कायदा,
अपनी सोच पर शर्मिंदगी कुछ ज्यादा है

ख़ुद से जूझने में फ़ना था जीस्त भी
नींदें हैं कम ख्वाब कुछ चलते ज्यादा हैं

अपने मोबाइल को सिराहना बना रखा है
कब आएगा पैगाम इंतज़ार कुछ ज्यादा है

हमारे शहर में अब भी खिजां का मौसम है
शज़र पर फूल कम खार कुछ ज्यादा हैं

परिंदों की परवाज़ बंधी सी रहती क्यों है
सैयाद ने भी रखें क़फ़स कुछ ज्यादा हैं

सूखी मिट्टी पे दरारें भी उभर आई हैं लेकिन
बेवजह आज आँखों में बरसात कुछ ज्यादा है

दवा तो मौजूद है हर मर्ज़ हर ज़ख्म की देखो
फिर भी पैमाने की ज़रूरत कल से ज्यादा है

ज़ख्म तो सब पुराने हो कर निशान बन गए
ग़म है की अब भी पलकों पे ताज़ा-ताज़ा है

दुनिया की भीड़ में ठहरे लम्हों के दरमियाँ
कतरा-कतरा ज़िन्दगी का ज़ौक़ आधा है

ग़मों में ढूंढते रहती हैं पता खुशियों मगर
कहीं रंगी तो कभी ज़िन्दगी में सादगी ज्यादा है

फिर चली आती हैं उम्मीदें लौट-लौट कर
न जाने ऊपर वाले ने रखा क्या इरादा है

अभी रेस में बचे हैं ग़मगीन पैरोँ के निशां
दवा मुझसे भी बीमार बहुत ही ज्यादा है

फिर नतीजा ढूंढते हैं मंज़िलें और रास्ते
एक रास्ता मैखाने, एक इबादतगाह जाता है

कहाँ है छाँव नीम की थके मुसाफ़िर के लिए
आबलापा को मेहनत औ मशक्कत ज़्यादा है

आसमां देता नहीं अब और सहारा उड़ने का
कटी पतंग एक, लूटने वाले गली में ज़्यादा हैं

चेहरों पे रोज़ सजा करते हैं मुखौटे नए नए
इंसान की सोच में भी दिखावा कुछ ज़्यादा है


(सह-भागिता-आनंद खत्री ,गुंजन अग्रवाल 'चारू' ,रिपुदमन मागों, अनिता शर्मा, राजेश सिक्का,प्रीती शर्मा, फर्रुख नदीम,मो.शब्बीर)


22/03/16


सह-भागिता #20 - देखते हैं, सोचते हैं पर अब दिल से काम नहीं लेते



देखते हैं, सोचते हैं पर अब दिल से काम नहीं लेते
सरेआम महफ़िल में अब उनका नाम नहीं लेते...

भूलते हैं ख्वाब में उनको हम कभी- कभी लेकिन ,
खोकर याद में उनकी मगर अब जाम नहीं लेते...

साथ चलने को रास्तों में धूप- छाँव न भी हो तो भी ,
ठहर कर हम दरख्तों का कभी एहसान नहीं लेते

बेनामी ओढ़ ली है हर तरफ के अंजाम की तरह,
अब हम किसी का दिल कभी एहसान नहीं लेते...

आईने में देख अक्स अपना तुझे पहचानते हम हैं
तेरी बेदिल अदाओं से कोई इलज़ाम नहीं लेते

चिराग़े सहर के बूते रहोगे कब तक जलोगे तुम
ये बात मेरी तुम क्यों कभी मान क्यों नहीं लेते...

देखो दिनों में शराफ़त की धूप उग आती है आज कल
जुगनुओं से रौशनी क्यों अब कभी उधार नहीं लेते

अफ़सोस रहेगा जब सोचोगे आइन्दा फिर कभी
गिरते हुए को चाहत से अब संभाल क्यों नहीं लेते

माज़ी अब बहुत रुलाता है ज़िंदगी हार क्यों नहीं देते
आइन्दा के तलातुम से कश्ती निकाल क्यूँ नहीं लेते

सुना है अदा से फिर मेरा नाम पुकार पूछता है कोई
अपने अंदर के "मैं" को हम सब मार क्यों नहीं लेते


(सह-भागिता - गुंजन अग्रवाल 'चारू' ,आनंद खत्री , अनिता शर्मा,राजेश सिक्का , विकास त्रिपाठी )


22/03/16



सह-भागिता #19 - मैं तन्हा चाँद, तुम पूरा आसमान



मैं तन्हा चाँद, तुम पूरा आसमान
उफन रहा है बादलों में रूमान

बिखरे है मोती पिरो रहा हूं माला
बना के तस्बीत नाम लूँगा आला

हबीब सा हूँ, न समझे रकीब कोई
तेरा ग़मगुशार , तेरा तबीब कोई

जुगनुओं के साथ भेजी है चिट्ठी यहाँ
कोई दिलदार रहनुमा हो वहाँ

तुम जवाब में खुशबु से लिखना कलाम
आ रहा है तूफान, अब पढ़ लेना पैग़ाम

दिल की सरहदों को क्या पहरे, लगाम
यायावर है, उसका कब एक मुकाम

अंजान सी बारगाह में पेश मेरा भी सलाम
सुना है, है एक दोस्त तुम्हारा बेनाम

हुस्न वालों ने कर रखा है मोहब्बात को इनाम
मिलेगी मोहोब्बत तभी होगा शहर में नाम

या कि गुमनाम रह ले, कुछ तो पर्दादारी हो
फिर से हो ना जाए कोई शायर बदनाम...


(सह-भागिता - आनंद खत्री , रिपुदमन मागों, अनिता शर्मा, अंजलि ओझा, मो.शब्बीर , राजेश सिक्का )


21/03/16





सह-भागिता #18 - ले तेरी बज़्म में हम, बे-नक़ाब हो ही गए



ले तेरी बज़्म में हम, बे-नक़ाब हो ही गए
डाली जो तूने नज़र, नायाब हो ही गए

ख़याल हकीकत से खूबसूरत न थे
और समय पे अस्ल से मिलते न थे

उस जामाज़ेब की ज़ौ के क्या कहने
के जिसके इश्क़ में, ख़ाना-ख़राब हो ही गए

जब भी मिले तो दिन बारा-वफ़ात हो गए
दरमियाँ हकीकत के, तुमको देखा तो ख्वाब हो गए

ए दिल्लगी तेरे इस जस्ब पे कई कैस बर्बाद हो गए
फितरत है लफ्जों की, नज़्म में ढले जज़्बात हो गए

क्यों तुमको सुनने वाले बेहिसाब हो गए
बुझे भी इस तरह कि आफताब हो गए

फिर दिल जले इक दौर की किताब हो गए
ज़रा सी ढील क्या मिली,पतंग आप हो गए


(सह-भागिता - आनंद खत्री, प्रीति शर्मा, अन्जली ओझा, अनिता शर्मा, रिपुदमन मागों , झिलमिल जैन)


21/03/16


सह भागियों का परिचय : MEMBER INTRODUCTION


नाम: सूरज राय "सूरज"
उम्र : जिस्मानी 56, दिल, मन लगभग 17 1/2 साल, और इतना ही रहेगा ।
कार्य :डिफेंस अकाउंट में सीनियर ऑडिटर काम "ज़िंदगी भर उसे हम "जोड़ते-घटाते" हैं । लोग ज़ख़्मों मे "गुणा" करके "भाग" जाते हैं ।
 कविता : शायरी कविता की कोई ग्रामर नहीं जानता और न ही सीखने की कभी कोशिश की । भावुक हूँ बीमारी की हद तक तो शायद वही लिखवा लेती है । मेरी शायरी की सच्चाई.. जब भी कोई भी पल मिला है मुझे ग़म लेकर । मैंने काग़ज़ को सब बता दिया कलम लेकर ।
सहभागिता :
सूरज राय सूरज ने दो किताबें लिखी हैं - 
१.  धुआँ धुआँ सूरज 
२. मैं तुम्हारा चेहरा 







नाम : सरोज सिंह “सूरज “
उम्र : ४६ साल ...लेकिन मन के किसी कोने में आज भी एक बच्ची बैठी हुई है ।
कार्य : प्राचार्य - महाराणा प्रताप
शहर : सतना
कविता : प्रकृति का साथ और एकांत बहुत पसंद है .... किताबें , संगीत , कलम और रंग-तूलिका सबसे अच्छे मित्र हैं । भीड़ में भी खोए खोए रहने की बुरी आदत भी है ..
सहभागिता :








नाम : सुधीर कुमार पाण्डेय “व्यथित “
उम्र : इस संसार मे लगभग पिछले 56 सालों से मुकम्मल मुकाम। मतलब उम्र लगभग अब तक छप्पन
कार्य : मध्यप्रदेश के बिजली महकमे में  कार्य पालन अभियंता (सिविल) 35 साल
शहर :
कविता : कविता का जीवन में प्रवेश और तब से कविता से बेइंतहा प्यार दोस्ती... बहुत बाँटा है मुझे इस कविता ने .. ये लगातार कामयाब कोशिश भी करती रही कि बचा रहे भीतर का आदमी मुझमें .... सो कहता हूँ मैं कि जैसे है वैसे ही दिखें चलो कविता लिखें..|
सहभागिता :








नाम : आनंद खत्री "सूफी बेनाम"
उम्र : 45 साल,दिल की उम्र 75 साल
कार्य: वास्तुविदय , ऐतिहासिक इमारतों का संरक्षण, पावर-लिफ्टर, थिओसोफिस्ट
शहर : नोएडा
कविता :संक्षेप में - हम कवी हैं, कविता की हर विधी , हर रूप सीखने की लालसा रखते हैं । अगर कोई कुछ सीखाना चाहे तो हम हाज़िर हैं। तजुर्रबा चंद रिश्तों का है । हर दोस्त हर अपना हमें अपनी नज़र से देखता है और एक नजरिया मेरा भी है।
सहभागिता - एक उम्र लिखती थी मेरे दिन हर रोज़, सोचा क्यों न साथ लिख जाओ।



 




नाम : अनिता शर्मा “अनु”
उम्र : सदियाँ समेटे हूँ खुद में, आंकड़ों में कैसे माप पाओगे
कार्य : प्रयासरत हूँ औरों की आँखों में ख़ुशी और होंठों पर हंसी लाने के
शहर : जयपुर
कविता : मेरे लिए रूह की परतों में लिपटी गुमसुम सदा
सहभागिता : अलग - अलग धागे से जुलाहे की भांति बुनना
















नाम
:अल्पना नागर 
उम्र:   27 वर्ष 
कार्य : अध्यापिका
शहर : नई दिल्ली 
कविता:मैं लिखना नहीं जानती बस कलम जब हाथ में होती है मन में उमड़ घुमड़ रहे घने भाव कागज़ पर स्वतः बरस जाते हैं , भावुक व अंतर्मुखी होना मेरी कमजोरी है । 
सहभागिता :भावों की जुड़ती कड़ियां , एक अनवरत सिलसिला सीखने का





नाम : फ़ारूख़ नदीम 
उम्र : २५ साल 
कार्य : वास्तुकला का छात्र हूँ
शहर : दिल्ली 
कविता :
सहभागिता:







नाम : गुंजन अग्रवाल 'चारू
उम्र : ३४ साल
कार्य : गृहणी, रेकी मास्टर, पेंटिंग-आयल ऑन कैनवास
शहर : खुर्जा
कविता : मेरे लिये कविता माध्यम है अपने विचारों और भावों को प्रस्तुत करने का, जब लिखती हूँ तो ख्यालों को आज़ादी पूरी रहती है 
सह-भागिता : सह-भागिता में हम एक दूसरे के विचारों को समझ कर उसको एक -भाव में प्रस्तुत करते हैं

ज़मीं पर हूँ फलक सी मैं ,      
कभी चंचल सबा सी मैं 
बन जाऊं आफ़ताब कभी,
कभी अधूरे महताब सी मैं.......







नाम :मोहम्मद शब्बीर 
उम्र : ३४ साल 
कार्य :जे एस पी एल 
शहर : रायगढ़ 
कविता :
सहभागिता: मैं सहभागी बन के सीखता हूँ 






नाम :पूजा बंसल
उम्र : बचपना जाता नही और जवानी जाने नही देती मैं...!!
शहर :मेरठ
काम :क्लीनिकल साईकलोजिस्ट
कविता : मैं खुद  गजल सी हूँ..!
सहभागिता : या तो सीख लो या सीखा दो ... !!:)









नाम : पूजा श्रीवास्तव “कनुप्रिया” 
उम्र : है मेरी उम्र कुछ पलों की बस, एक पल में हज़ार सदियाँ हैं 
कार्य : प्रबंधक- लोक सेवा केंद्र 
शहर : बुदनी 
कविता : मैं...... 
सहभागिता  : मैं कहूँ तुम कहो चलो साथी, बात से बात कोई की जाए




नाम :राजेश सिक्का 
उम्र : ४६ साल 
कार्य :इंटीरियर डेकोरेटर 
शहर : लखनऊ 
कविता : पता नहीं था के दिल में है,आप सब के साथ से जुबां पे आ गयी
सहभागिता: आप लोगों  के साथ मेरी ज़िन्दगी की पहली सहभागिता है,इससे  पहले मैंने कभी कुछ नहीं लिखा 







नाम : रिपुदमन मगोंन  
उम्र : ४६  साल 
कार्य : सॉफ्टवेयर डेवलपर 
शहर : जयपुर 
कविता :
सहभागिता: प्रतिक्रिया से कविता बनना मुश्किल है।  सहभागिता पे मेहनत करनी होगी। 







· 
नाम : उत्कर्ष सिंह सोमवंशी
उम्र : 35 बसंत बीत गये
कार्य : तन्त्रांश अभियांत्रिक
शहर : बैंगलोर
कविता : स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा ! कवि जब भावनाओं की प्रसव से गुजरता है तो कविता प्रस्फुटित  होती है
सहभागिता : संवेदना का अंतर्सेतु ,हमारी प्रक्रियाओं की प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जनभागिता ही सहभागिता !





नाम : विकास त्रिपाठी 
उम्र : ४४ साल 
शहर : बैंगलोर 
कार्य : डायरेक्टर ( इनफार्मेशन सर्विसेस ग्रुप)
कविता : लखनऊ में मेरी पैदाइश हुई।  हिंदी और उर्दू का साँझा परिचय हमेशा रहा।  अहमद फ़राज़ , ग़ालिब, वसीम बरेलवी, गुलज़ार, खुमार बाराबंकी जैसे शायरों का ख्याल हमेशा साथ रहा 
सह -भागिता: अपने अलावा किसी और के साथ पहली बार लिखा।  ये ग्रुप बनाने का शुक्रिया। .









सह-भागिता #14 - ग़ज़ल में रूबरू है हसरतों के साये



ग़ज़ल में रूबरू है हसरतों के साये
साया को धूप भी हो कोई पिघल जाए
जाए ही क्यूँं, गर सुकूँ तेरी बाँह में आए...
आए न फिर वो मौसम सुहाना आये
सुहाने सफर को जायज़ ठिकाना
ठिकाने ढूँढ़ते ये आशिक़ पुराना आये
पुरानेपन का नज़राना कुछ तसवीरें
तस्वीरें में ही बची न यादें सिमट जायें
यादों ने रखा है हमें ज़िंदा उम्र के लिये
उम्र कहीं सांसों में न बिखर जाये
बिखरे से सावन पे बहकें तेरी बाहें
बाहों के हार जो गले में डल जाये
डाल नज़र का पहरा, मुड़कर ना देखें...
देखे जो औरो को मैं बिखर जाऊ...
जाऊं कहाँ अब तेरे बिन मैँ कहाँ जाऊं...


(सह-भागिता - आनंद खत्री, अनिता शर्मा, राजेश सिक्का, विकास त्रिपाठी, गुंजन अग्रवाल 'चारू' )


(Rule was to pick the any word of the previous line)


19/03/16


Saturday, 23 April 2016

# 61 f. गुलज़ार साहब की कविता : "ये कैसी उम्र में आ कर मिली हो तुम" पे सह भागिता का अनु-नाद - ६. पूजा श्रीवास्तव कनुप्रिया


नहीं उम्मीद से उम्मीद कोई
नहीं भाती हैं जो खुशियाँ संजोई
पड़ी हैं झुर्रियां गालों पे अब तो
दरारे उँगलियों पे आ गयीं हैं
हुए मोहताज चश्मे के नज़ारे
घनी जुल्फें सफ़ेदी पा चुकी हैं
कलाई कांपती रहती है हरदम
पकड़ कमज़ोर अब होने लगी है
उमर भी शाम की देहलीज़ पर अब
थकन को ओढ़कर सोने चली है
हिसाबों में उलझकर खोया जीवन
नहीं मालूम क्या पाया गंवाया
मगर जोड़ी थी पायी पायी खुशियाँ
उन्हें भी अपने अपनों पर लुटाया
सुनो ए आखिरी उम्मीद मेरी
ये जिद पर क्यूँ अड़ी हो तुम
अगर कुछ पहले मिलतीं बात भी थी
ये कैसी उम्र में आकर मिली हो तुम

~ पूजा श्रीवास्तव कनुप्रिया






सह-भागिता : बशीर बद्र # 51 # 54 - " सर पे साया सा दस्ते दुआ याद है अपने आँगन में इक पेड़ था याद है " ~ बशीर बद्र



२१२-२१२-२१२-२१२

काफ़िया : स्वर आ

रदीफ़ : याद है




१.

सर पे साया सा दस्ते दुआ याद है

आख़री वक्त की वो तेरी सदा याद है




कांपते होठ वो देखना एक-टक

किस मुलाक़ात का दिन पता याद है




शाम की हसरतों का सिरा ढूंढता

न खुदा और न नाखुदा याद है




बद-नसीबी को आसमां ज़रा दूर था

आँख से जो आंसू गिरा था याद है




बिन बताये ही आएगी एक दिन ये अज़ल

काठ को लौ-लहर हर अदा याद है




धूप में रहता है साये के जैसा जो

सांस की साँझ पर बिछड़ना याद है




बीती उस शाम की हर फ़िक्र शुक्रिया

अब न सहरा, न ज़ुल्मे-क़ज़ा याद है




रुकते बढ़ते कदम जब न रुक के थमे

आसमां उड़ क्षितिज अटकना याद है




बेसब्र बाद बे-वजह नज़दीकियां

बरखा में घर मे मेरा जला याद है




टूटकर देखना वो समा बारहा

बीतना वो कहर हर कज़ा याद है







~ सह-भागिता #51 बशीर-बद्र ( सूरज राय सूरज, सुधीर पांडेय, सरोज सिंह परिहार, चारु अग्रवाल, अनिता शर्मा ,आनन्द खत्री )




२.

अपने आँगन में इक पेड़ था याद है

आसरा था उसी साथी का याद है




छांव में बैठ कर काटना दोपहर

मेढ़ नाखून से खुरचना याद है




गुनगुनी धूप छन छन पत्तों से वो

वो बिनौले सेमल के, हवा याद है




ओस को छेड़ती सर्दि की धूप भी

और तुझसे मेरा झगड़ना याद है




गर्मियो की रात मे छत पे लेटे लेटे

देर तक चांद से बाते करना याद है




रात आती गुजर जाती बिन तेरे जब

सिसकियों की तरह सिसकना याद है




~ सह-भागिता #54 बशीर-बद्र( सुधीर पांडेय, सरोज सिंह परिहार, चारु अग्रवाल, विकास त्रिपाठी ,आनन्द खत्री )



# 61 e. गुलज़ार साहब की कविता : "ये कैसी उम्र में आ कर मिली हो तुम" पे सह भागिता का अनु-नाद - ५. अनिता शर्मा 'अनु'



ये कैसी उम्र में आकर मिले हो तुम!

काली मिट्टी सी उमर बीते जमाना हुआ

पिछली बरसातों में जो बाढ़ आयी थी

उससे तो मेड़ भी कटने लगी थी

तालाब की मिट्टी काला धन सा

मोतिया,चांदी, खाल भी सटकने लगी थी

उम्र भर जो उगाई थी फसल प्यार की

उसके बीज की वक्कल बस तेरी है

पाला सूखा जब सब गुज़रा था

तब जाकर यूं ही आए हो तुम

ब्याज साहूकार का मुझ पर

क़र्ज़ बढ़ गया कुछ रिश्तों का

जिनसे उमर ढोते आयी हूँ सारी

अब अपना पराया भी समझो तुम

तय है जनमों का रिश्ता ये समझो

तब सही उमर में मिलना मुझको





~ अनु



# 61.d. गुलज़ार साहब की कविता : "ये कैसी उम्र में आ कर मिली हो तुम" पे सह भागिता का अनु-नाद - ४. गुंजन अग्रवाल 'चारू'




ये कैसी उम्र में आकर मिली हो तुम

जीवन के इस अंतिम पड़ाव में...

याद है तुमको वो मोड़

जहाँ से बिछड़े थे कई तूफां दिल में समेटे

बीते वक़्त के दरीचों से

तुम्हारा वो मुस्कुराता चेहरा

अब दिखाई नहीं देता

बस तुम्हारी कुछ खुरदरी सी यादें हैं

जो आज भी चुभ जाती हैं

मेरे ज़हन की मखमली दीवारों पर

मेरे वजूद की टेढ़ी मेढ़ी मेड़ों पर

तुमने जो पगडंडियां बनायीं थीं

तुम्हारे पैरों की छाप

आज भी है वहां पर...

ये अब कैसी उम्र में आकर मिली हो तुम

जहां हर आती सांस हर जाती सांस पर भारी है

तुमसे बिछड़ने का मातम

आज भी जिस्म की रग रग में जारी है

सूख गया है पौधा उम्मीदों का

तुम्हारी यादों वाला हिस्सा अब कितना खाली है

क्यूं अब इस मोड़ पर आकर मिली हो तुम?




............ चारू...........


# 61 c. गुलज़ार साहब की कविता : "ये कैसी उम्र में आ कर मिली हो तुम" पे सह भागिता का अनु-नाद - ३. आनन्द खत्री - सूफ़ी बेनाम



बहती नदिया दरिया के घर

हम मिलते फिर उस मिट्टी में

जाने किस संजोग से देखो

फिर मिली हो दिल ग़रज़ी में

बीता गुज़रा मौसम सा है

इस उम्र में तुमसे मिलने में

मेड़ बना कर सींचा तुमको

यादें भर पोली मिटटी में

तर रखता था गर्मी में भी

सूखा सौंधा एक चिट्ठी में

सूनापन एक महक सा देखो

सजता घर के हर कोने में

आँखें धुंधली कर बैठा हूँ

बरसों बंद तिजोरी में

हम तक कोई आहट आयी

तेरी आस थी उस झोली में

ये कैसी उम्र में मिली हो मुझसे ..................







~ सूफ़ी बेनाम



# 61 b. गुलज़ार साहब की कविता : "ये कैसी उम्र में आ कर मिली हो तुम" पे सह भागिता का अनु-नाद - २. उत्कर्ष सिंह सोमवंशी



ये कैसी उम्र मे आ कर मिली हो तुम


कैसे चन्द लमहों मे समेटूँ सब कुछ ..


अश्क़ ए तवातुर मे मैने कैसे बितायी सदियाँ ..


हसरतें ए परवाज़ लिये कैसे कटी है रतियाँ ..


तुम जो होती दम-साज तो कैसा होता


इस बात को सोचूँ तो फिर एैसा होता


सहर तेरी तो रात मेरी होती


इश्क तेरा मुझपे खुदा साज होता


ग़म्जा आखो पे तेरी नज़्म मै करता रहता बिखर कर


ढूडती रही आँखे जिसे सदियो


मताये जान कहा थी बहुत अनमोल थी तुम ...


कहूँ भी क्या कि ये कैसी उम्र मे आ कर मिली हो तुम ..


तुम्हारी राह मे जो मैने हज़ारों फूल पाले थे ..


गए सुखे मे मेरे फ़ातिहे मे काम आये वो.






~ उत्कर्ष



# 61 a.गुलज़ार साहब की कविता : "ये कैसी उम्र में आ कर मिली हो तुम" पे सह भागिता का अनु-नाद - १. सरोज सिंह परिहार -सूरज




उम्र का  क्या है

उम्र तो गुजरती ही है लेकिन ....

सुना .है प्यार की कोई उम्र नहीं होती

प्यार तो बस हो जाता हे ...

उम्र के किसी भी मोड़ पर...

जब तुम बोओगे आँखों की फसल...

तो बंजर ज़मीन पर भी उगेंगे

मेरे हजार चेहरे... और देखना.,,

प्यार की तपिश से बरसेंगे बादल....

हमें क्या लेना देना किसी के

हिस्से की मिट्टी से..धूप से ....

एहसास की मिट्टी में जज्बात की तपिश

काफी है फसल लहलहाने के लिए ....

उम्र का क्या है उम्र तो ढलती ही है

लेकिन प्यार की कोई उम्र नहीं होती ...





~ सूरज


सह-भागिता #11 - ख़ाक बनकर भी लिखेंगे दौर



ख़ाक बनकर भी लिखेंगे दौर
हम अपना एक जहां बसाएंगे..

जलती रेत पे होंगे पैरों के निशाँ
लहरों से भी न कभी मिट पायेंगे..

बैठकर देखना तमाशा वक्त का
हम तो वक्त के आगे निकल जाएंगे..

आरज़ू की किताबत से क्या समझ पायेंगे
हम तो बस ऐसे ही जिए जाएंगे..

मत करना अफसोस, गर तन्हाइयां मिले
सच के रास्ते बिन परछाई भी चलते जाएँगे..

अपनी हसरतों को मंज़िल तक ले जाएंगे
खाक को गजल की स्याही बनायेंगे..

दाग दामन एक बहार में फिर से
दर्द की महफ़िल फिर सजायेंगे..

दहलीज़ पे दिए ना रखना रोशन
अब हम लौट के फिर न आयेंगे..

मुक़द्दर की राहों में घर बसायेंगे
फिर भी तुम्हे हम न भूल पाएंगे..

हर तजरीबे (तजुर्बे) पे
तुझको रज़ा पायेंगे..


(~सह-भागिता - आनंद खत्री, अनिता शर्मा, अन्जली ओझा, राजेश सिक्का, विकास त्रिपाठी)


17/03/16


सह-भागिता #10 - गुड़ की भेली सा है ये इश्क़



गुड़ की भेली सा है ये इश्क़
गुनगुनाती धूप में
गेहूं के बालियों की
अठखेली सा है ये इश्क़
सुबह का अहसास है ये इश्क़
मेरे साये सा ये इश्क़
रगों में लहू सा दौड़े इश्क़
मुनिया की गुड़िया सा है ये इश्क़

हाय इश्क़ इश्क़ ये इश्क़....


मेरा वजूद इश्क़, मेरी कज़ा इश्क़
कभी हँसता मुझमें कभी रोता इश्क़
बहुत बेवफा है, मगर वफा भी इश्क़
पुरानी संदूक के कोने में दुबका इश्क़
कान-पालि में झूमती बालियां है ये इश्क़

हाय इश्क़ इश्क़ ये इश्क़....


हयात-ए-हया है हाय ये इश्क़
मीरा का जहर का प्याला है ये इश्क़
प्यार की मधुशाला है ये इश्क़
डुबोये कभी...कभी उबारे है इश्क़
तूफान में तिनकों के सहारे है इश्क़

हाय इश्क़ इश्क़ ये इश्क़....


और क्या कहूँ के क्या है ये इश्क़
कुछ तेरे जैसा,कुछ मेरे जैसा है इश्क़
आँखों में ख्वाब सजाये ये इश्क़
दिल में लाखों अरमां जगाये ये इश्क़

हाय इश्क़ इश्क़ ये इश्क़....


मैं और तू है ये इश्क़
जिंदगी में फागुन सा है ये इश्क़
तुझमें मुझसा और मुझमें तुझसा है ये इश्क़
अब्र सांसों का, भरोसा मुफलिसी का इश्क़

हाय इश्क़ इश्क़ ये इश्क़....


हज़ारों मर्ज़ है दवा भी इश्क़
गुब्बारे में भरती साँस सा ये इश्क़
जुदा होकर भी साथ होने का एहसास ये इश्क़
बड़ा तेज़ है, एक दिन मारेगा ये इश्क़

हाय इश्क़ इश्क़ ये इश्क़....





(~सह-भागिता - आनंद खत्री, अनिता शर्मा, अन्जली ओझा, गुंजन अग्रवाल 'चारू' , राजेश सिक्का, फ़र्रुख नदीम, विकास त्रिपाठी )


17/03/16



सह भागिता गुलज़ार 33 # 36 # 38 # 41 # 44 # 46 - "दिल में ऐसे ठहर गये हैं गम " ~ गुलज़ार




#33

दिल में ऐसे ठहर गये हैं गम

कुछ बेघर रिश्तेदार पुराने

दहलीज़ पे किवाड़ खटखटाते

झुर्राए सायों के चेहरे

नींद सुलाते ख्वाब थपकियाँ

करवट रात खोजती सिलवट

जुल्मत अकेले मन कोने में

आह चढ़ी यादों की शिरकत

दस्तक हैं सांसें धुकनी पर

बुझाती जलन पुतली झपककर

गीली लकड़ी धुंआ बिखेरे

गुलबांग सबा चूमती हसरत

दिन चढ़ती गुल-ए-ज़ार दिक्कतें

उम्र गुज़री तनहा इस कदर







#36

जैसे जंगल में शाम के साये

अँगुलियों से गुदे

रेतीले अल्फ़ाज़ों पे

धूल हुई ग़ज़ल उड़ाते

रश्क़ लम्हों की उड़ान, गुबार

किरकिरी कुनमुनाती परवाज़

भारी पलकों पे पिघला काजल

आरास्तगी अमावस रात

उड़ता आँचल ढील पकड़ से

पत्ते फिसलते पेड़ के हाथ

बिखरे जंगल सूखे मधु-कोष

चांदनी के छूने से जल उठा

नीरवता में खग-डैनों का शोर







#38

जाते जाते सहम के रुक जायें

गुज़रे वक़्त को पुलिंदे में बांधे

लम्हे एक लम्स का हिसाब मांगते

रंग -ए-बू की हिरासत में निखार

लरज़ते लकीरों में मुकम्मल होने को

किरमिच की कुलबुलाहट

मंजुल साया अमल होने को

हरदम बरहम दर-बदर भटकता

कभी रुकता बैठता और फिर चलता




#41

मुड़के देखें उदास राहों पर

किसी सुस्त मोड़ पे उलझे

कुछ सूखे पत्ते बाट जोहते

हवा के किसी कतरे का

सुगबुगाहट है आने की वहीं से

तुमसे जुदा हुए थे जहाँ

शाम की बुझती मुस्कराहटों से

छंटता नहीं धुंआ

तुम्हारी ही बातें करते रहे

बूढ़ी नज़रें इंतज़ार इन्तेहाँ

बताते तुम हो खुशनुमा

ये उदास रहें और ये समां







#44

कैसे बुझते हुए उजालों में

जगर-मगर अँधेरा सा है

सायों को दूर करती शाम

घरोंदों को बढ़ते बेदम कदम

सांझ की लिपटी चादर

अल्साये रास्ते और उलझन

शायद तम को ग़र्क़ तक खंगारता

ज़िन्दगी का गाँठ लगा सिरा

ढूंढता दूर कहीं मेरा हमदम








#46

दूर तक धूल ही धूल उड़ती है

किन -किनाने लगी हैं आँखें

फिर गुज़रा गुबार-ए-लश्कर शायद

नज़र अंजाम तक न पहुंची पर खूब रहा

गिर्दाब में ज़इफ़ वो घूम रहा

सूरज नज़रें ढक के बैठा शायद

ये वो दयार नहीं जिसे मंज़िल कहें

धूल जुड़ी बसती कोई मेयार नहीं




(सह -भागिता - अनिता शर्मा , अंजलि ओझा , उत्कर्ष , गुंजन अग्रवाल 'चारू' , विकास त्रिपाठी , राजेश सिक्का , सूफी बेनाम )







(किरमिच - canvas) (कुलबुलाना -कुछ कहने को व्यग्र) (गर्क़ - drown as in bera-garq) (गिर्दाब - बवंडर,ज़'इफ़ - असहाय) (मेयार- status) (आरास्तगी - decoration)





सह-भागिता #9 - पुराने इश्क़ में ये दर्द नया सा क्या है



पुराने इश्क़ में ये दर्द नया सा क्या है
जल गया जो सब तो बचा सा क्या है

उनको खबर तक ना हुई खाक होने की
कोई बतलाये हमें भी ये माजरा क्या है

रुसवा न होने दिया तुमको कभी यूँ हमने
हाल-ए-दिल को अगर है तो आसरा क्या है

ना तुम कुछ पूछना ना हम बताएँगे उलझन
कहने सुनने को दरमियाँ अब बचा क्या है

गुलों की राह में क्यों खार सजाते हो तुम
एक नाचीज़ से दिल जलता रहा क्या है

सोचकर लगाया जो दिल, वो इश्क़ ही क्या है
तुझ से आखिर मेरा अब रिश्ता क्या है

चलो फिर अजनबी बन जाओ, ख्वाबों में ना आना
झुकी नजरों की तस्लीम का फ़लसफ़ा क्या

आँख नम हुई है शायद तेरी, बारिश है...
ग़म-ए-दिल से कोई पूछना कि आसरा क्या है...

एक कश्ती लिख जाना उम्मीदों की नाम मेरे
समंदर है ख़यालों का, तो अब डूबना क्या है

आओ, एक ग़ज़ल की पतवार बनाते हैं
कुछ पल साथ मिलकर रूठना क्या है

कुछ तुम्हारी सुनते, कुछ अपनी बताते हैं .
कहो बेताब क्यों था काजल बहा क्या है


(सह-भागिता - अनिता शर्मा ,फ़र्रूख़ नदीम, गुंजन अग्रवाल 'चारू' , आनंद खत्री, राजेश सिक्का, अंजलि ओझा)


16/03/16



सह-भागिता #8 - लोग मिलते बिछड़ते हैं रूठ जाते हैं



लोग मिलते बिछड़ते हैं रूठ जाते हैं....
यादों में फिर आकर सताते हैं....

मंज़िलें भूल रास्तों में बैठ जाते हैं,
जहाँ चौराहे, घर से पहले मिल जाते हैं.

ज़हन की गलियाँ भी अक्सर अजीब होती हैं
ख्याल खुद से ही टकरा के लौट जाते हैं

दिखता है हर तरफ चेहरा मेहबूब का सा,
हर एक दर पे तलबगार चले जाते हैं ...

तेरे ही ख़्वाब-ओ-ख़याल में यूँ अक्सर
अपने होने का असर ढूंढती रहती हूँ मैं

मेरे हाथों की लकीरों में तू लिखा है क्या?
कदम हर बार तेरी ओर चले आते हैं ।

तू मृगतृष्णा सा चहुंओर, पर कहीं भी नहीं
एक कशिश तेरी ओर मुझको खींच लाती है

मिल ना पाता मेरे दिल से कोई और तुझ सा
रास्ता तेरे घर का ढूंढ, लौट आते हैं

आज फिर तेरी बेवफ़ाई को माफ़ किया,
चलो फिर से एक घर नया बनाते हैं ...

सिलसिला चलता रहे रुठने मनाने का
एक दुसरे को समझने समझाने का...

आतिश-ए-करार से किसी को जलाने का,
सब्र की राह में फिर उसको आज़माने का....

दिलों की दूरियां ज़ाहिर हो न जाये कहीं
खेल है ये तो, शमा-परवाने का,

चलो चल कर फिर आग में नहा के आतें हैं...
आओ आज उसे फिर से जलाते है
एक और शाम का सौदा कर के आते हैं।


(सह-भागिता - राजेश सिक्का,विकास त्रिपाठी, चारु अग्रवाल, आनंद खत्री , अनिता शर्मा, फ़र्रूख़ नदीम, प्रीति शर्मा , अंजलि ओझा)


16/03/16



सह-भागिता #5 - जवाब लेने आये शाम ए महफ़िल में



जवाब लेने आये शाम ए महफ़िल में,
उस लौ की जलन पे सवाल टूट गया..

नज़र पे रेंगती रहीं शुआएं इस कदर
मै अब्र का मानिन्द था फिर भी पिघल गया..

दीये को वो कब तलक जलाये रखेगा
शायद अंदाज़-ए-लौ जिस्म में ढल गया...

अंधेरों से कब तलक टकराएगा
क्यों नहीं दरिया के उस पार पहुंच गया ..

शोखियां भी पिघली शाम के दामन में
कोई तिश्नगी का साथ कब तक निभाएगा...

फिर किसने छेड़ा ज़िक्र उसका ...
शायद आज भी पैमाना छलक जायेगा

ख्वाबो की मिट्टी भिगोना छींटों से
बिरवा फिर कोई नया जाग पायेगा ...

आएगा दर पे तेरे सजदे को,
फिर भी सर न वो झुकाएगा

नज़र से तस्लीम नज़र को करना
अदब का तकाज़ा नज़रअंदाज़ हो जायेगा

पानी सी नज़र लिए बैठा है वो
सादगी सी उसकी आँख नम हो जायेगा

हौसलों से उसे नज़्म में लिख देना
वर्ना कोई और सितम बहार लायेगा

ख्वाब को असल तक हमदम ला देना
चाँद का पैरहन, सितारों को दामन बन जायेगा

रंग सुबह की लाली का उतर जाये जब
हथेली पर आँधियों सी हिना महकायेगा

आसमाँ दबे आफ़ताब को हमनवा करना
खिले सुबह कली तो उम्र की दुआ लाएगा

हम तो हैं सफ़र में,
मंज़िल मिले ये भी दुआ करना...


(~ सह-भागिता - उत्कर्ष सिंह सोमवंशी,आनन्द खत्री, विकास त्रिपाठी, अनिता शर्मा, राजेश सिक्का, अंजलि ओझा)


14/03/16




सह-भागिता #12 - अतुल्य तुमको मेरी ज़रुरत क्यों हो



अतुल्य तुमको मेरी ज़रुरत क्यों हो
जो नहीं मिलता उसकी चाहत क्यों हो

जो साथ नहीं उसकी आदत क्यों हो
खाक हो तुम तो इबादत क्यों हो

रास्ता बादलों का संग नदी के ठहरा
बिन मौसम यहाँ बरसात क्यों हो

सुरमई अंखियों पर आँसूओं का पहरा
काजल डाल ले जो वो, तो ढलती रात क्यों हो

आखरी बूँद तक बोतल की ज़रुरत क्यों हो
अपना है वो फिर भी अजनबी सी मुलाकात क्यों हो

हर मुलाकात का ज़िक्र औ शिनस क्यों हो
दिल पत्थर है,तो दिखावे को आँख समन्दर क्यों हो

तू मेरा नहीं इस बात का यकीन तो हो
मेरे यकीन को लहर-ए-समंदर क्यों हो

कही मझदार में शिकवा हो कश्तियों से क्यों
मुझे डूब जाने को, साहिल की ज़रूरत क्यों हो


(~सह-भागिता - अंजलि ओझा, आनंद खत्री,अनिता शर्मा, गुंजन अग्रवाल 'चारू' , राजेश सिक्का, फ़र्रुख़ नदीम)


18/03/16



सह-भागिता #13 - उसके दर पे क्यों सजदे करता है...



उसके दर पे क्यों सजदे करता है...
आखिर वो है कौन? तेरा क्या लगता है?

शिकायत में सही ज़िक्र रोज़ होता है,
इक इक शिकवा,प्रीत का इजहार रखता है...
मुझे मोहोब्बत है ये इकरार करता है...

नाम ले लो अगर, फिर शर्मसार हो जायें,
चलो आज फिर, बदनाम हो जायें ...
शहर में चर्चा आम हो जाये,

चलो बिकते है, शायद किसी को आराम हो जाये ...
मोल है "मैं", जो तू खरीदार हो जाये,

कुर्बान ये दिल बार बार हो जाए.
तू जिसको मिले है वो तो मालामाल हो जाए,

पाई पाई की चोरी हलाल हो जाये ...
चल दरिया में डूबे, सोहनी-महिवाल हो जाये,
हर एक ज़ुबां में हमारा नाम आ जाए....
हाल-ए-हसरत कोई कमाल हो जाए...

है दिल के दरमियान कोई समुन्दर कहीं देख
ये साहिल पे टूटने का इक़बाल करता है


(~सह-भागिता - विकास त्रिपाठी, राजेश सिक्का, अनिता शर्मा, अंजलि ओझा, आनंद खत्री)


18/03/16



सहभागिता #6 - मोतियों की चादर झटक गया कोई



मोतियों की चादर झटक गया कोई
जैसे बेजार सपना ले रहा उधार कोई

अब कौन समेटेगा मुझको आ कर
मुझको बिखरा के चल दिया कोई

आसमाँ की परात से बिछड़ा तारा हूँ
पत्थर समझ क्यों ठुकरा गया कोई

जवाहिर कोयले की ख़ाक में पल बढ़ा
कोहिनूर सम्राटों के सर चढ़ा गया कोई

आग है सीने में, तो चमकता है वो
आग में तपा के सोना बना गया कोई

जाने किस रिश्ते के गहने सा सजा हूँ मैं
रूठा था खुद से...खुद से मिला गया कोई

बिछुआ, मंगलसूत्र, चूड़ा बन सज गया कोई
इस नाचीज़ को बेशकीमती बना गया कोई

रिश्तों को कुंदन की कीमत बताना अजब
कांच को कोहिनूर फिर बना गया कोई

सुलगता था शरारे सा दिल में इस कदर
दिल सुलगने की चीज़ थी जता गया कोई

मद्धम आँच पर चढ़ाओ इश्क़ की हांडी
इश्क़ बीरबल की हांड़ी, पका गया है कोई

कहते है उड़ जाती है इश्क़ में नींदें
आँखों की तिजोरी से ख्वाब चुरा गया कोई

इक वही तो आसरा रह गया जीने का
और उस को बेसिर बता गया कोई

अब इस दुनिया में किसका करे ऐतबार
जब अपना दिल ही हो गया और कोई...


(सह-भागिता -आनंद खत्री, अनिता शर्मा, गुंजन अग्रवाल 'चारू', अन्जली ओझा, राजेश सिक्का,प्रीति शर्मा)


15/03/16





सह-भागिता #4 - फिर आग लगी है गुलशन में



फिर आग लगी है गुलशन में
धूं-धूं कर जलते नशेमन में

भवरों कि ये सियासत है,
जो ज़ाहिर दिखता है ख़िरमन में.

कोई सहलायेगा काँटों को
ये वहम बुझा देना मन से...

मोहब्बत को तालीम मे बाँधो तो
कुछ दाग़ सजा लो दामन में.

तुम राह ढूँढना उस लौ की
जो रातों में जलता अख्तर हो...

या तुलसी के चौबारे पर
इक दिया जला हो आँगन में...

है ख़ुमार तुम्हारे इरादे पर
या धुंए का पर्दा आँखों पर...

बस आंसुओं से धुला कब है
जो दाग लगा हो दामन पर....

यूँ गुलों के आशिक़ हो कर भी
हर तमन्ना से जुदा हम हैं...

बस ज़िक्र किया था खुशबु का,
तिमिर के गुनहगार क्या हम हैं...


~ सह-भागिता (आनंद खत्री, उत्कर्ष सिंह सोमवंशी, अनिता शर्मा, राजेश सिक्का)
14/03/16