"कुछ काल सभी से मन बहला, आकाश सभी को छलता है"
"सोना चाँदी हो जाता है,
जस्ता बनकर खो जाता है,
पल-पहले नभ के राजा का अब पता कहाँ पर चलता है।
चुपके से चंदा ढ़लता है।" ~ हरिवंश राय बच्चन (चुपके से चाँद निकलता है)
रह-रह दरवाज़े की आगल को
आभास अंजोर का रहता है
चेहरा तेरा भी तकिये पर कुछ धुंधला-धुंधला दिखता है
दिन धीरे धीरे जलता है
"सोना चाँदी हो जाता है,
जस्ता बनकर खो जाता है,
पल-पहले नभ के राजा का अब पता कहाँ पर चलता है।
चुपके से चंदा ढ़लता है।" ~ हरिवंश राय बच्चन (चुपके से चाँद निकलता है)
रह-रह दरवाज़े की आगल को
आभास अंजोर का रहता है
चेहरा तेरा भी तकिये पर कुछ धुंधला-धुंधला दिखता है
दिन धीरे धीरे जलता है
ओढ़ थकन दिन भर की शब्
हर रोज़ झरोखे पर आकर
चुप चाप मुझे ही तकता है
कुछ कहता है न सुनता जब चुपके से चाँद निकलता है
बस खोया खोया रहता है
जब खो जाता है चैन कहीं
और नींद नहीं जब आती है
तन्हाई में दीदार मेरा, करने को खूब तड़पता है
पर जाग न जाए रात कहीं
आहें भरता है डरता है
चांदनी पिघलने लगती ज्यों
नदिया जैसी लहराती है
अरुणामयी शामें कुमकुम सिंदूरी सूरज बिंदिया है
संध्या के भाल चमकता है
बदली का रंग भी काला सा
चुभता अंतस में भाला सा
कहारता है नयनों से किन्तु अधरों से सहज रहता है
मन ही मन में पिघलता है
अलसाई आँखो का कोना..
जैसे बात बिना ही रोना..
नही सजन आये है अबतक, फिर आँचल क्यूँ ये गिरता है
चुपके से चाँद निकलता है
रातों की मधु का ख़ुमार सखी
उल्लास सुबह की सिन्दूरी
आखों के गीड़ से सनकर भी
एक सहर अपूर्व चाहत में बयार ले कर निकलता है
पर अतीत से नाते रखता है
सागर की लहरों में डूबा
हर शाम को सूरज होता है
अरूणोदय काली रातो को हर प्रथम रश्मि से खोता है
सपनों में रंग भरता है
सूरज अलमस्ती मे झूम झूम
धरती का कण कण चूम चूम
देखो कैसी बेफिक्री से हर रोज ही खूब मचलता है...
धरती का रंग बदलता है
रजनीगंधा रात महकती
रविप्रिया उषा खनकती है
कण- कण भर आस का सृष्टि जाग्रत नव सृजन को उमगती है
रूकता कब रथ सप्त अश्व वाला है
हर रोज़ झरोखे पर आकर
चुप चाप मुझे ही तकता है
कुछ कहता है न सुनता जब चुपके से चाँद निकलता है
बस खोया खोया रहता है
जब खो जाता है चैन कहीं
और नींद नहीं जब आती है
तन्हाई में दीदार मेरा, करने को खूब तड़पता है
पर जाग न जाए रात कहीं
आहें भरता है डरता है
चांदनी पिघलने लगती ज्यों
नदिया जैसी लहराती है
अरुणामयी शामें कुमकुम सिंदूरी सूरज बिंदिया है
संध्या के भाल चमकता है
बदली का रंग भी काला सा
चुभता अंतस में भाला सा
कहारता है नयनों से किन्तु अधरों से सहज रहता है
मन ही मन में पिघलता है
अलसाई आँखो का कोना..
जैसे बात बिना ही रोना..
नही सजन आये है अबतक, फिर आँचल क्यूँ ये गिरता है
चुपके से चाँद निकलता है
रातों की मधु का ख़ुमार सखी
उल्लास सुबह की सिन्दूरी
आखों के गीड़ से सनकर भी
एक सहर अपूर्व चाहत में बयार ले कर निकलता है
पर अतीत से नाते रखता है
सागर की लहरों में डूबा
हर शाम को सूरज होता है
अरूणोदय काली रातो को हर प्रथम रश्मि से खोता है
सपनों में रंग भरता है
सूरज अलमस्ती मे झूम झूम
धरती का कण कण चूम चूम
देखो कैसी बेफिक्री से हर रोज ही खूब मचलता है...
धरती का रंग बदलता है
रजनीगंधा रात महकती
रविप्रिया उषा खनकती है
कण- कण भर आस का सृष्टि जाग्रत नव सृजन को उमगती है
रूकता कब रथ सप्त अश्व वाला है
पंक्षी नभ मे गाते है
सब इधर उधर मँडराते है,
तारों से जगमग रात रात ढले
आकाश के चित्र पटल पे वो अकिंत यादें कर जाते है
सूरज हर रोज निकलता है
(सह-भागिता : पूजा श्रीवास्तव कनुप्रिया, सरोज सिंह परिहार, अनिता शर्मा, आनन्द खत्री, गुंजन अग्रवाल 'चारू', पूजा बंसल, सुधीर पांडे, उत्कर्ष सिंह सोमवंशी)
सब इधर उधर मँडराते है,
तारों से जगमग रात रात ढले
आकाश के चित्र पटल पे वो अकिंत यादें कर जाते है
सूरज हर रोज निकलता है
(सह-भागिता : पूजा श्रीवास्तव कनुप्रिया, सरोज सिंह परिहार, अनिता शर्मा, आनन्द खत्री, गुंजन अग्रवाल 'चारू', पूजा बंसल, सुधीर पांडे, उत्कर्ष सिंह सोमवंशी)