Saturday, 23 April 2016

# 61 e. गुलज़ार साहब की कविता : "ये कैसी उम्र में आ कर मिली हो तुम" पे सह भागिता का अनु-नाद - ५. अनिता शर्मा 'अनु'



ये कैसी उम्र में आकर मिले हो तुम!

काली मिट्टी सी उमर बीते जमाना हुआ

पिछली बरसातों में जो बाढ़ आयी थी

उससे तो मेड़ भी कटने लगी थी

तालाब की मिट्टी काला धन सा

मोतिया,चांदी, खाल भी सटकने लगी थी

उम्र भर जो उगाई थी फसल प्यार की

उसके बीज की वक्कल बस तेरी है

पाला सूखा जब सब गुज़रा था

तब जाकर यूं ही आए हो तुम

ब्याज साहूकार का मुझ पर

क़र्ज़ बढ़ गया कुछ रिश्तों का

जिनसे उमर ढोते आयी हूँ सारी

अब अपना पराया भी समझो तुम

तय है जनमों का रिश्ता ये समझो

तब सही उमर में मिलना मुझको





~ अनु



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